जोधपुर की ऐतिहासिक धरा पर 18 फरवरी 1899 को पंडित सेवारामजी व्यास और श्रीमती गोपी देवी के घर जन्मे जय नारायण व्यास का व्यक्तित्व भारतीय स्वाधीनता संग्राम और आधुनिक राजस्थान के निर्माण में एक अमिट हस्ताक्षर है। एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे व्यास जी के जीवन का संघर्ष केवल विदेशी हुकूमत के खिलाफ नहीं, बल्कि रियासती कुप्रथाओं और 'बाहरी' हस्तक्षेप के विरुद्ध भी था, जिसने उन्हें मारवाड़ के एक प्रखर नेता के रूप में स्थापित किया। 1920 के दशक के शुरुआती वर्षों में उन्होंने मारवाड़ हितकारिणी सभा के माध्यम से अपने राजनीतिक जीवन की नींव रखी, जिसका मुख्य उद्देश्य जोधपुर को 'गैर-जोधपुरी' अधिकारियों के प्रभाव से मुक्त कराना और स्थानीय हितों की रक्षा करना था। 'मारवाड़ मारवाड़ियों के लिए' के नारे के साथ उन्होंने प्रशासनिक सुधारों की आड़ में होने वाले शोषण के विरुद्ध आवाज उठाई, हालांकि 1924 में इस संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया गया, लेकिन इसने व्यास जी के भीतर क्रांति की जो अलख जगाई वह कभी ठंडी नहीं हुई। सुभाष चंद्र बोस जैसे महान क्रांतिकारियों से प्रेरणा पाकर उन्होंने भंवरलाल सर्राफ के साथ मिलकर 1934 में जोधपुर प्रजामंडल की स्थापना की और बाद में यूथ लीग व मारवाड़ लोक परिषद के जरिए जनमानस को जागरूक किया। जब भी जोधपुर रियासत में उनके आंदोलनों पर दमन चक्र चलता, वे अजमेर को अपना केंद्र बनाकर अपनी गतिविधियों का संचालन करते रहे।

स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही उनके राजनैतिक कौशल को नई ऊंचाइयां मिलीं और 3 मार्च 1948 को वे जोधपुर राज्य के प्रधानमंत्री बने। देश के एकीकरण के बाद, राजस्थान के लोकतांत्रिक सफर में उनकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई जब उन्होंने दो बार प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में कमान संभाली। हालांकि 1952 के पहले विधानसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा और टीकाराम पालीवाल मुख्यमंत्री बने, लेकिन उनके व्यक्तित्व का प्रभाव ऐसा था कि किशनगढ़ उपचुनाव में जीत हासिल करने के बाद वे पुनः 1 नवंबर 1952 को सत्ता के शिखर पर पहुंचे। मुख्यमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने सामंतवाद के अवशेषों को समाप्त करने और एक आधुनिक प्रशासनिक ढांचे की स्थापना में महती भूमिका निभाई। प्रदेश की राजनीति के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी उन्होंने राज्यसभा सदस्य के रूप में 1957 से लेकर अपनी मृत्यु पर्यंत देश की सेवा की। 14 मार्च 1963 को नई दिल्ली में उनके निधन के साथ भारतीय राजनीति का एक प्रखर सूर्य अस्त हो गया, जिनका अंतिम संस्कार उनकी जन्मभूमि जोधपुर के चांदपोल में किया गया।

जय नारायण व्यास का जीवन केवल राजनीतिक पदों की प्राप्ति का इतिहास नहीं है, बल्कि वह एक ऐसे योद्धा की कहानी है जिसने अपने सिद्धांतों के लिए कभी समझौता नहीं किया। आज जोधपुर का जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय और बीकानेर की जय नारायण व्यास कॉलोनी जैसे संस्थान उनके नाम को जीवित रखे हुए हैं, जो आने वाली पीढ़ियों को उनके अदम्य साहस, लोकतान्त्रिक मूल्यों के प्रति निष्ठा और राजस्थान की मिट्टी के प्रति उनके अगाध प्रेम की याद दिलाते रहते हैं।

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