कौन थीं Indumati Goenka? विदेशी कपड़ों की होली जला जेल जाने वाली राजस्थान की पहली वीरांगना
1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में जेल जाने वाली राजस्थान मूल की पहली महिला इंदुमती गोयंका का जीवन परिचय और स्वतंत्रता संग्राम में उनका अतुलनीय योगदान।

कलकत्ता की धरती पर 1914 में जन्मी इंदुमती गोयंका का जीवन देशभक्ति और सामाजिक सुधारों का एक अद्भुत संगम था। प्रसिद्ध कांग्रेस कार्यकर्ता पमराज जैन के घर जन्मी इंदुमती को बचपन से ही राष्ट्र सेवा के संस्कार विरासत में मिले थे। बेथ्यून स्कूल की छात्रा रहीं इंदुमती ने अपनी शिक्षा के साथ-साथ समाज में महिलाओं की स्थिति और उनकी शिक्षा के विस्तार को अपना मुख्य लक्ष्य बनाया। वर्ष 1929 में विवाह के बंधन में बंधने के बाद भी उनके भीतर की क्रांतिकारी ज्वाला शांत नहीं हुई और उन्होंने 'नारी सत्याग्रह समिति' द्वारा आयोजित असहयोग आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेना शुरू कर दिया। वे बाजार में विदेशी कपड़ा व्यापारियों की दुकानों के सामने धरने पर बैठती थीं और विदेशी कपड़ों की होली जलाकर ब्रिटिश हुकूमत को चुनौती देती थीं। उनके अदम्य साहस का प्रमाण उस ऐतिहासिक घटना से मिलता है जब एक विरोध प्रदर्शन के दौरान एक ब्रिटिश सार्जेंट ने उनके हाथ से राष्ट्रीय ध्वज छीनने की कोशिश की थी। इंदुमती ने न केवल उस सार्जेंट का हाथ अपने दांतों से काट लिया, बल्कि झंडा छीनकर गर्व के साथ आगे बढ़ गईं।
उनका संघर्ष केवल सड़कों तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने एक मांग पत्र जारी कर ब्रिटिश अधिकारियों को चेतावनी दी कि वे भारतीय महिलाओं को प्रताड़ित करना बंद करें। उन्होंने भारतीय सैनिकों को भी आजादी के आंदोलन में शामिल होने का आह्वान किया और उनके इस मांग पत्र को दिल्ली, कानपुर और आगरा जैसे प्रमुख शहरों में वितरित किया गया। इसी सक्रियता के कारण वर्ष 1930 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और नौ महीने की जेल की सजा सुनाई गई। जेल से आने के बाद उन्होंने महिलाओं को संगठित करने के लिए 'राष्ट्रीय महिला समिति' की स्थापना की। जब कानपुर में दंगे भड़के, तो वे शांति स्थापना के लिए वहां जाना चाहती थीं; हालांकि प्रारंभ में महान नेता गणेश शंकर विद्यार्थी ने उन्हें सुरक्षा कारणों से रोका, लेकिन बाद में उन्होंने अपने पति और सहयोगियों के साथ मिलकर दंगा प्रभावित क्षेत्रों में सांप्रदायिक सद्भाव बहाल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राजस्थान मूल की होते हुए भी बंगाल से सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान गिरफ्तार होने वाली वे पहली राजस्थानी महिला बनीं।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी इंदुमती गोयंका ने विश्राम नहीं किया और अपना शेष जीवन सामाजिक विकास के कार्यों को समर्पित कर दिया। उन्होंने विशेष रूप से वंचित वर्गों और महिलाओं के उत्थान के लिए जमीनी स्तर पर कार्य किया, जिससे समाज में एक सकारात्मक परिवर्तन आया। इंदुमती गोयंका का जीवन यह सिखाता है कि वीरता केवल युद्ध के मैदान में ही नहीं, बल्कि वैचारिक दृढ़ता और सामाजिक जिम्मेदारी निभाने में भी निहित है। आज वे न केवल राजस्थान और बंगाल के लिए बल्कि पूरे भारत के लिए नारी शक्ति और बलिदान की एक अमर प्रतीक हैं, जिनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को निस्वार्थ राष्ट्र सेवा की प्रेरणा देती रहेगी।

