भारतीय उपमहाद्वीप की बहुसांस्कृतिक परंपरा में यहूदी समुदाय का इतिहास सदियों पुराना माना जाता है, लेकिन 20वीं शताब्दी के मध्य के बाद जिस अध्याय ने विशेष ऐतिहासिक महत्व प्राप्त किया, वह इज़राइल में बसे भारतीय यहूदियों का प्रवासन और पुनर्स्थापन था। आज इज़राइल में रहने वाले भारतीय मूल के यहूदियों में महाराष्ट्र के बेने इज़राइल, केरल के कोचीन और परदेशी यहूदी, मुंबई और कोलकाता के बगदादी यहूदी तथा पूर्वोत्तर भारत के ब्नेई मेनाशे समुदाय शामिल हैं। इन समुदायों ने केवल धार्मिक पहचान के आधार पर इज़राइल में नई सामाजिक संरचना नहीं बनाई, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक स्मृतियों, भाषाओं और परंपराओं को भी मध्य-पूर्व की भूमि तक पहुँचाया। भारतीय यहूदियों की यह यात्रा आधुनिक राष्ट्रवाद, धार्मिक पहचान और प्रवासी समुदायों के पुनर्गठन की एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कथा मानी जाती है।

1947 में भारत की स्वतंत्रता और 1948 में आधुनिक इज़राइल राज्य की स्थापना के बाद भारतीय यहूदियों के बड़े पैमाने पर “अलियाह” अर्थात इज़राइल प्रवासन की प्रक्रिया शुरू हुई। ब्रिटिश भारत के समय यहूदी समुदाय कई सामाजिक समूहों में विभाजित थे, जिनमें बेने इज़राइल, बगदादी यहूदी और कोचीन यहूदी प्रमुख थे। महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र से जुड़े बेने इज़राइल समुदाय की संख्या सबसे अधिक थी, जबकि केरल के कोचीन और परदेशी यहूदियों की पहचान समुद्री व्यापार और प्राचीन सभ्यताओं से संपर्क के कारण विकसित हुई थी। कोलकाता और मुंबई के बगदादी यहूदी मुख्यतः पश्चिम एशिया से आए व्यापारिक परिवारों के वंशज थे। भारत विभाजन के दौरान बढ़ते धार्मिक ध्रुवीकरण और पश्चिम एशिया में यहूदी राष्ट्र की स्थापना ने भारतीय यहूदियों के एक बड़े हिस्से को इज़राइल की ओर प्रवास के लिए प्रेरित किया। विशेष रूप से कोचीन यहूदियों ने बड़ी संख्या में केरल छोड़कर इज़राइल के कृषि बस्तियों और शहरी इलाकों में बसना शुरू किया।

इज़राइल पहुँचने के बाद भारतीय यहूदियों ने नेवातिम, शाहार, युवाल और मेसिलात ज़ायन जैसे मोशाव अर्थात कृषि समुदायों में नई सामाजिक और आर्थिक पहचान बनाई। यरुशलम के कतामोन क्षेत्र, बीरशेबा, रामला, डिमोना और येरुहम जैसे शहरों में भी बड़ी संख्या में भारतीय मूल के यहूदी बस गए। कोचीन यहूदियों ने अपने साथ जुडियो-मलयालम भाषा और दक्षिण भारतीय सांस्कृतिक परंपराएँ जीवित रखीं, जबकि बेने इज़राइल समुदाय ने जुडियो-मराठी बोली को पीढ़ियों तक संरक्षित किया। भारतीय भोजन, पारिवारिक संरचना, धार्मिक अनुष्ठान और सामुदायिक मेल-जोल ने इज़राइल के बहुजातीय समाज में भारतीय यहूदियों को विशिष्ट पहचान प्रदान की। यही कारण है कि इज़राइल में बसे भारतीय यहूदियों को केवल प्रवासी समुदाय नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत के जीवित वाहक के रूप में भी देखा जाता है।

हालाँकि यह प्रवासन पूरी तरह सहज नहीं था। 1950 और 1960 के दशक में बेने इज़राइल समुदाय को नस्लीय और धार्मिक भेदभाव का सामना करना पड़ा। कुछ इज़राइली धार्मिक अधिकारियों ने उनके यहूदी वंश पर प्रश्न उठाए और अन्य यहूदी समुदायों के साथ विवाह संबंधों में बाधाएँ खड़ी कीं। भारतीय और अंतरराष्ट्रीय प्रेस में यह मुद्दा व्यापक रूप से चर्चा का विषय बना। कई पर्यवेक्षकों ने इसे धार्मिक विवाद से अधिक नस्लीय पूर्वाग्रह का परिणाम माना, क्योंकि भारतीय यहूदियों की त्वचा का रंग और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि यूरोपीय मूल के अश्केनाज़ी यहूदियों से भिन्न थी। 1962 से 1964 के बीच बेने इज़राइल समुदाय ने विरोध प्रदर्शन और भूख हड़तालें आयोजित कीं, जिसके बाद इज़राइली रब्बिनेट ने आधिकारिक रूप से उन्हें “हर दृष्टि से पूर्ण यहूदी” घोषित किया। यह निर्णय केवल धार्मिक मान्यता भर नहीं था, बल्कि इज़राइल में भारतीय यहूदियों की सामाजिक स्वीकृति और सम्मान की दिशा में महत्वपूर्ण मोड़ माना गया।

समकालीन इज़राइल में भारतीय यहूदियों की स्थिति अपेक्षाकृत स्थिर और समाहित मानी जाती है। बीरशेबा और रामला जैसे शहरों में बेने इज़राइल समुदाय की बड़ी आबादी आज भी मौजूद है, जबकि नई पीढ़ियाँ सेना, शिक्षा, कला, प्रबंधन और खेल जैसे क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। भारतीय मूल के यहूदियों ने इज़राइली समाज में घुलने-मिलने के बावजूद भारत से अपने सांस्कृतिक संबंध पूरी तरह समाप्त नहीं किए। पारिवारिक रिश्ते, सामुदायिक पत्रिकाएँ, पारंपरिक संगीत और भारतीय त्योहार आज भी इस पहचान को जीवित रखते हैं। दूसरी ओर पूर्वोत्तर भारत के ब्नेई मेनाशे समुदाय का इज़राइल प्रवासन 21वीं सदी में भी जारी रहा और 2025 में इज़राइली सरकार ने अगले पाँच वर्षों में हजारों ब्नेई मेनाशे यहूदियों को इज़राइल लाने की योजना को स्वीकृति दी। यह निर्णय दर्शाता है कि भारतीय यहूदियों की ऐतिहासिक यात्रा अभी भी समाप्त नहीं हुई है, बल्कि वह आधुनिक वैश्विक प्रवासन और सांस्कृतिक पुनर्संयोजन की निरंतर प्रक्रिया का हिस्सा बनी हुई है।

भारतीय इतिहास के व्यापक परिप्रेक्ष्य में इज़राइल में बसे भारतीय यहूदी उस सांस्कृतिक सेतु का प्रतीक हैं, जिसने दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया को धार्मिक, व्यापारिक और मानवीय संबंधों के माध्यम से जोड़े रखा। उनकी कहानी केवल एक धार्मिक समुदाय के विस्थापन या पुनर्वास की कथा नहीं, बल्कि भारतीय बहुलतावाद, सह-अस्तित्व और सांस्कृतिक अनुकूलन क्षमता का भी प्रमाण मानी जाती है। भारतीय यहूदियों ने जिस प्रकार अपनी भाषाओं, भोजन, लोकस्मृतियों और सामाजिक परंपराओं को नई भूमि में संरक्षित रखा, उसने प्रवासी इतिहास के अध्ययन में उन्हें एक विशिष्ट स्थान प्रदान किया है। इसी कारण इज़राइल में भारतीय यहूदियों का इतिहास आज भारत और इज़राइल के सांस्कृतिक संबंधों की एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर के रूप में देखा जाता है।

Pratahkal HQ

Pratahkal HQ

Next Story