रेगिस्तान की तपती रेत और सामाजिक बिखराव के बीच से एक ऐसे युगपुरुष का उदय हुआ, जिसने न केवल एक नई संस्कृति और सभ्यता को जन्म दिया, बल्कि वैश्विक इतिहास की धारा को भी हमेशा के लिए बदल कर रख दिया।

सातवीं शताब्दी के अरब में जन्मे हज़रत मुहम्मद को इस्लाम धर्म का संस्थापक माना जाता है, जिन्हें इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार अल्लाह के अंतिम पैगंबर और संदेशवाहक के रूप में जाना जाता है। उनका पूरा नाम अबू अल-कासिम मुहम्मद इब्न अब्द अल्लाह इब्न अब्द अल-मत्तलिब इब्न हाशिम था, और अरबी भाषा में 'मुहम्मद' शब्द का अर्थ 'अत्यंत प्रशंसनीय' होता है। मुस्लिम इतिहासकारों के अनुसार, उनका जन्म ८ जून, ५७० ईस्वी (आमुल-फील यानी हाथियों के वर्ष) में अरब के रेगिस्तानी शहर मक्का के एक प्रतिष्ठित लेकिन कम समृद्ध बनू हाशिम कबीले में हुआ था, जो कुरैश जनजाति का एक हिस्सा था। हज़रत मुहम्मद का प्रारंभिक जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण रहा; उनके जन्म से लगभग छह महीने पहले ही उनके पिता अब्दुल्लाह का निधन हो गया था, और जब वे मात्र छह वर्ष के थे, तब उनकी माता अमीना भी एक बीमारी के कारण चल बसीं। इस तरह बचपन में ही अनाथ हो जाने के बाद, उनका पालन-पोषण उनके दादा अब्दुल-मत्तलिब और बाद में उनके कबीले के नए नेता व उनके सगे चाचा अबू तालिब तथा उनकी पत्नी फातिमा बिंत असद की देखरेख में हुआ। अपने कबीले के कमजोर सदस्यों की उपेक्षा के उस दौर में भी उनके संरक्षकों ने उनका पूरा ख्याल रखा। किशोरावस्था में उन्होंने व्यापारिक कला सीखने के लिए अपने चाचा के साथ सीरिया की यात्रा की, जहाँ उनकी मुलाकात बहरी नामक एक ईसाई भिक्षु से हुई, जिसने उनके भीतर दिव्य लक्षणों को पहचाना था। जैसे-जैसे वे बड़े हुए, अपनी ईमानदारी, निष्पक्षता और उच्च नैतिक चरित्र के कारण उन्होंने समाज में 'अल-अमीन' (विश्वसनीय) और 'अल-सादिक' (सच्चा) जैसी प्रतिष्ठित उपाधियाँ प्राप्त कीं। उनकी इसी ख्याति से प्रभावित होकर मक्का की एक समृद्ध विधवा खादिजा बिंत खुवायलिद ने उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा, जिसे २५ वर्षीय मुहम्मद ने स्वीकार कर लिया और यह विवाह अत्यंत सुखद रहा, जिससे उन्हें चार पुत्रियाँ और दो पुत्र रत्न प्राप्त हुए, जिनमें से पुत्रों का बचपन में ही देहांत हो गया था।

हज़रत मुहम्मद के जीवन और आध्यात्मिक यात्रा में चालीस वर्ष की आयु एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई, जब वे मक्का के पास जबल अल-नूर पर्वत पर स्थित हिरा नामक गुफा में कई दिनों तक एकांत में ध्यान और प्रार्थना में लीन रहते थे। वर्ष ६१० ईस्वी में इसी गुफा में उन्हें पहली बार जिब्राईल (फरिश्ते) के माध्यम से अल्लाह का संदेश या 'वही' प्राप्त हुई, जिसने उन्हें पवित्र कुरान की पहली आयतें पढ़ने का आदेश दिया। इस दिव्य अनुभव से वे प्रारंभ में अत्यंत विचलित हुए, लेकिन उनकी पत्नी खादिजा और उनके ईसाई चचेरे भाई वराका इब्न नौफल ने उन्हें ढांढस बंधाया। इसके बाद लगभग तीन वर्षों के अंतराल के बाद जब पुनः संदेश आने शुरू हुए, तब वर्ष ६१३ ईस्वी के आसपास उन्होंने मक्का में सार्वजनिक रूप से एकेश्वरवाद का प्रचार करना शुरू किया और यह घोषणा की कि ईश्वर एक है, अल्लाह के प्रति पूर्ण समर्पण (इस्लाम) ही सही मार्ग है, और वे स्वयं ईश्वर के पैगंबर हैं। उनके इस संदेश का शुरुआती दौर में मक्का के शासकों और शक्तिशाली व्यापारियों द्वारा कड़ा विरोध किया गया, क्योंकि मक्का का पूरा आर्थिक और धार्मिक ढांचा काबा में रखे ३६० कबीलाई कबीलों के बुतों (मूर्तियों) पर टिका हुआ था, जिसे मुहम्मद के संदेश से सीधा खतरा था। इस दौरान इस्लाम अपनाने वाले शुरुआती लोगों में उनकी पत्नी खादिजा, उनके दस वर्षीय चचेरे भाई अली इब्न अबी तालिब, घनिष्ठ मित्र अबू बक्र और दत्तक पुत्र ज़ैद शामिल थे। जैसे-जैसे अनुयायियों की संख्या बढ़ी, कुरैश कबीले ने मुसलमानों पर भीषण अत्याचार और सामाजिक-आर्थिक बहिष्कार शुरू कर दिया, जिसके कारण ६१५ ईस्वी में कुछ मुसलमानों को असीरिया (इथियोपिया) प्रवास करना पड़ा। अंततः ६२२ ईस्वी में मक्का के नेताओं द्वारा उनकी हत्या की साजिश रचे जाने के बाद, हज़रत मुहम्मद ने अपने अनुयायियों (मुहाजिरों) के साथ मक्का छोड़कर ४५० किलोमीटर उत्तर में स्थित यसरिब (Medina) की ओर प्रस्थान किया। इस ऐतिहासिक घटना को 'हिजरत' कहा जाता है, जो इस्लामिक या हिजरी कैलेंडर की शुरुआत का प्रतीक बनी।

मदीना पहुँचने पर वहाँ के स्थानीय कबीलों (अंसार) ने उनका भव्य स्वागत किया और उन्हें कबीलाई संघर्षों को सुलझाने के लिए मुख्य मध्यस्थ नियुक्त किया। हज़रत मुहम्मद ने मदीना के आठ कबीलों और मुस्लिम प्रवासियों के बीच एक ऐतिहासिक समझौता कराया जिसे 'मदीना का संविधान' कहा जाता है, जिसने एक नए धार्मिक और राजनीतिक समाज (उम्मा) की नींव रखी। इसके बाद मक्का के कुरैश कबीले के साथ मुसलमानों के कई सशस्त्र संघर्ष हुए, जिसमें ६२४ ईस्वी में ऐतिहासिक 'बद्र की लड़ाई' में कम संख्या होने के बावजूद मुसलमानों ने एक अभूतपूर्व जीत हासिल की। हालांकि, इसके बाद ६२५ ईस्वी में 'उहुद की लड़ाई' में अनुशासनहीनता के कारण मुसलमानों को नुकसान उठाना पड़ा और ६२७ ईस्वी में मक्का की १०,००० की सेना द्वारा मदीना की घेराबंदी को मुसलमानों ने 'खंदक की लड़ाई' में सूझबूझ से खाई खोदकर विफल कर दिया। इन संघर्षों के बीच ६२८ ईस्वी में 'हुदैबिया की संधि' हुई, जिसने दस साल के लिए युद्ध को रोका और मुसलमानों को मक्का में शांतिपूर्ण पहचान दिलाई। अंततः ६३० ईस्वी में मक्का के कबीलों द्वारा संधि की शर्तों का उल्लंघन करने के बाद, हज़रत मुहम्मद ने १०,००० मुस्लिम सैनिकों के साथ मक्का पर मार्च किया और बिना किसी बड़े रक्तपात के शहर पर विजय प्राप्त की। मक्का फतह करने के बाद उन्होंने सभी पुराने दुश्मनों के लिए आम माफी की घोषणा की और काबा के भीतर से सभी कबीलाई मूर्तियों को हटाकर इसे इस्लाम का सबसे पवित्र स्थल घोषित किया। अपने जीवन के अंतिम वर्षों में उन्होंने पूरे अरब प्रायद्वीप को एक सूत्र में पिरोया और ६३२ ईस्वी में मदीना से अपनी पहली और अंतिम ऐतिहासिक 'विदा की हज यात्रा' (विदाई तीर्थयात्रा) पूरी की, जहाँ माउंट अराफात पर दिए गए अपने ऐतिहासिक विदाई उपदेश में उन्होंने नस्लीय समानता, मानवाधिकारों की रक्षा, महिलाओं के साथ दयालुता का व्यवहार करने और कबीलाई खून-खराबे को हमेशा के लिए समाप्त करने की घोषणा की। इस यात्रा से लौटने के कुछ महीनों बाद वे गंभीर रूप से बीमार पड़ गए और सोमवार, ८ जून ६३२ ईस्वी को ६२ या ६३ वर्ष की आयु में मदीना में अपनी पत्नी आयशा के घर में अंतिम सांस ली, जहाँ आज मस्जिद-ए-नबवी के भीतर उनका पवित्र मकबरा (हरा गुंबद) स्थित है।

हज़रत मुहम्मद की विरासत केवल एक धर्म की स्थापना तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्होंने प्राचीन अरब समाज के भीतर गुलामी की प्रथा को हतोत्साहित करने, अनाथों और गरीबों के लिए 'जकात' (अनिवार्य दान) के माध्यम से आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने, और महिलाओं को संपत्ति व विरासत के अधिकार देकर एक युगांतरकारी सामाजिक और नैतिक सुधार किया था। उनके जीवनकाल में प्राप्त हुए ईश्वरीय संदेशों का संग्रह पवित्र 'कुरान' के रूप में आज दुनिया भर के करोड़ों मुसलमानों के जीवन का मुख्य आधार है, जबकि उनकी शिक्षाएं और व्यवहार (सुन्नत) जिन्हें 'हदीस' साहित्य में संकलित किया गया है, इस्लामिक कानून और संस्कृति के सबसे प्रामाणिक स्रोत माने जाते हैं।

Pratahkal HQ

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