सन् 1892 में मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले के भौंरासा गांव में जन्मे हरिभाऊ उपाध्याय का प्रारंभिक जीवन अकादमिक डिग्री से अधिक उनकी नैसर्गिक प्रतिभा और सृजनशीलता से परिभाषित हुआ। उनके सार्वजनिक जीवन का उदय 'औदुम्बर' नामक मासिक पत्रिका के प्रकाशन के साथ हुआ, जिसके संपादन की जिम्मेदारी उन्होंने 1911 में अपनी पढ़ाई के दौरान ही संभाल ली थी। साहित्य के प्रति उनका अटूट समर्पण उन्हें महान संपादक पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी के सान्निध्य में ले गया, जहाँ उन्होंने प्रतिष्ठित पत्रिका 'सरस्वती' में कार्य करते हुए अपनी लेखनी को धार दी। इसके पश्चात उन्होंने गणेश शंकर विद्यार्थी के 'प्रताप', 'हिंदी नवजीवन' और 'प्रभा' जैसे क्रांतिधर्मी प्रकाशनों के संपादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यद्यपि 1922 में उन्होंने 'मालव मयूर' नामक पत्रिका शुरू करने का प्रयास किया जो अधिक समय तक नहीं चल सकी, किंतु साहित्य के माध्यम से समाज को जागृत करने का उनका संकल्प कभी डगमगाया नहीं।

हरिभाऊ जी का व्यक्तित्व केवल संपादन तक सीमित नहीं था, बल्कि वे एक मौलिक विचारक और अनुवादक के रूप में भी उभरे। 'बापू के आश्रम में', 'सर्वोदय की बुनियाद', 'साधना के पथ पर', 'भागवत धर्म', 'मनन' और 'पुण्य स्मृति' जैसी उनकी कृतियाँ उनके दार्शनिक और आध्यात्मिक पक्ष को उजागर करती हैं, जबकि 'दूर्वादल' कविता संग्रह उनके हृदय की कोमलता का प्रमाण है। उनकी भाषाई शैली में सादगी, संस्कृत की तत्समता और मिश्रित शब्दावली का एक ऐसा सामंजस्य था जो पाठकों को सहज ही प्रभावित कर लेता था। उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू की आत्मकथा 'मेरी कहानी' और पट्टाभि सीतारमैया द्वारा लिखित 'कांग्रेस का इतिहास' जैसी महत्वपूर्ण अंग्रेजी पुस्तकों का हिंदी अनुवाद कर राष्ट्रीय विमर्श को जन-जन तक पहुँचाया।

महात्मा गांधी के विचारों से गहरे प्रभावित होकर हरिभाऊ उपाध्याय ने स्वयं को राष्ट्रीय आंदोलन की वेदी पर समर्पित कर दिया। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उन्हें तत्कालीन अजमेर राज्य में कई बार जेल की कठोर यातनाएं सहनी पड़ीं, लेकिन उनके सिद्धांतों की अडिगता ने कभी झुकना नहीं सीखा। स्वतंत्रता के पश्चात जब लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित हुई, तो वे अजमेर के मुख्यमंत्री के रूप में चुने गए। कालांतर में राजस्थान के एकीकरण के पश्चात मोहनलाल सुखाड़िया के आग्रह पर उन्होंने राज्य के वित्त मंत्री और फिर शिक्षा मंत्री के रूप में प्रशासनिक दायित्वों का कुशलतापूर्वक निर्वहन किया। राजनीति में रहते हुए भी वे मूलतः एक संवेदनशील और करुणामयी मनुष्य बने रहे। उनकी दूरदर्शिता का ही परिणाम था कि उन्होंने हटुंडी (अजमेर) में 'महिला शिक्षा सदन' और 'सस्ता साहित्य मंडल' जैसी संस्थाओं की नींव रखी, जो आज भी समाज में शिक्षा और सुलभ साहित्य का प्रसार कर रही हैं।

राजस्थान साहित्य अकादमी के अध्यक्ष के रूप में लंबे समय तक सेवा देने वाले हरिभाऊ उपाध्याय ने 25 अगस्त 1972 को इस नश्वर संसार से विदा ली। उनका संपूर्ण जीवन इस बात का साक्षी है कि किस प्रकार एक व्यक्ति अपने सिद्धांतों से समझौता किए बिना सत्ता और साहित्य के शिखर पर आसीन रह सकता है। उनकी छोड़ी हुई विरासत आज भी हिंदी साहित्य और भारतीय राजनीति में शुचिता और बौद्धिक चेतना का मार्गदर्शन कर रही है।

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