कौन थीं हाड़ी रानी सहल कंवर? मेवाड़ की वह वीरांगना जिनके बलिदान की कहानी सुनकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
मेवाड़ के चूंडावत सरदार रावत रतन सिंह की पत्नी हाड़ी रानी सहल कंवर के सर्वोच्च त्याग और ऐतिहासिक बलिदान की पूरी कहानी।

राजस्थान की मरुधरा अपने भीतर शौर्य और बलिदान की अनगिनत गाथाएं समेटे हुए है, जिनमें हाड़ा चौहान राजपूत संग्राम सिंह की पुत्री और सलूंबर के चूंडावत सरदार रावत रतन सिंह की पत्नी हाड़ी रानी सहल कंवर का नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। यह उस दौर की बात है जब मेवाड़ के महाराणा राज सिंह प्रथम ने मुगल सत्ता के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूंका था और अजमेर सूबे के मुगल गवर्नर के खिलाफ युद्ध में शामिल होने के लिए रावत रतन सिंह को बुलावा भेजा। रावत रतन सिंह का विवाह हुए अभी मात्र कुछ ही दिन बीते थे और मोहवश उनके कदम रणभूमि की ओर बढ़ने से हिचकिचा रहे थे। युद्ध क्षेत्र के लिए प्रस्थान करते समय अपने मन की दुविधा और पत्नी के प्रति अगाध प्रेम के कारण उन्होंने हाड़ी रानी से अपनी याद के तौर पर कोई निशानी मांगी ताकि वे उसे अपने साथ ले जा सकें। हाड़ी रानी सहल कंवर एक दूरदर्शी और कर्तव्यपरायण क्षत्राणी थीं, जिन्हें तुरंत इस बात का आभास हो गया कि उनका मोह उनके पति के मार्ग की बाधा बन रहा है और यही आसक्ति उन्हें मातृभूमि के प्रति उनके धर्म से विमुख कर सकती है। मेवाड़ की आन-बान और मर्यादा को सर्वोपरि रखते हुए उन्होंने एक ऐसा आत्मघाती और साहसिक निर्णय लिया जिसकी मिसाल पूरी दुनिया में कहीं नहीं मिलती। उन्होंने स्वयं को अपने पति के कर्तव्य पथ का रोड़ा न बनने देने के उद्देश्य से अपना शीश काटकर थाल में सजा दिया और एक सेवक के माध्यम से उसे निशानी के रूप में अपने पति के पास भिजवा दिया। जब रावत रतन सिंह के सामने वह थाल पहुंचा, तो अपनी पत्नी का कटा हुआ सिर देखकर वे स्तब्ध रह गए, किंतु उनके भीतर देशभक्ति और गौरव का संचार हुआ। उन्होंने अपनी वीरांगना पत्नी के बालों से उस शीश को अपने गले में बांध लिया और युद्ध के मैदान में मुगलों पर काल बनकर टूट पड़े। युद्ध की समाप्ति के पश्चात, जीवन के प्रति मोह समाप्त होने पर उन्होंने भी अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली, लेकिन हाड़ी रानी का यह सर्वोच्च बलिदान अमर हो गया। आज भी राजस्थान की लोक संस्कृति, गीतों और कविताओं में उनकी वीरता और साहस का बखान प्रमुखता से किया जाता है। प्रसिद्ध लेखक दानी सोलंकी ने अपनी पुस्तक 'हाड़ा रानी' में इस महाकाव्य जैसी प्रेम कहानी और त्याग को जीवंत किया है। उनकी स्मृति में टोंक जिले के टोडारायसिंह में 17वीं शताब्दी की 'हाड़ी रानी की बावड़ी' आज भी उनके इतिहास की गवाह है। राजस्थान सरकार ने उनके सम्मान में 'हाड़ी रानी महिला बटालियन' का गठन किया है और उनकी गाथा को राज्य के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है ताकि आने वाली पीढ़ियां इस महान त्याग से प्रेरणा ले सकें।
हाड़ी रानी सहल कंवर का बलिदान मात्र एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि कर्तव्य और राष्ट्रप्रेम की पराकाष्ठा है, जो सदियों बाद भी भारतीय नारी के अदम्य साहस और अडिग संकल्प का प्रतीक बनकर हमें गौरवान्वित करती रहती है।

