भारतीय आध्यात्मिक इतिहास के फलक पर गुरु जम्भेश्वर महाराज, जिन्हें प्यार से जम्भोजी भी कहा जाता है, एक ऐसे दूरदर्शी संत के रूप में चमकते हैं जिन्होंने आज से पाँच शताब्दियों पूर्व ही पर्यावरण और जीव रक्षा के महत्व को समझ लिया था। राजस्थान के नागौर जिले के पीपासर गाँव में विक्रम संवत 1508 की भाद्रपद वदी अष्टमी (जन्माष्टमी) की मध्यरात्रि को पंवार राजपूत परिवार में आपका जन्म हुआ। ठाकुर लोहट जी पंवार और माता हंसा देवी की संतान के रूप में जन्मे जम्भोजी का प्रारंभिक जीवन रहस्यों से भरा था। कहा जाता है कि जन्म के पश्चात उन्होंने सात वर्षों तक न तो कुछ बोला और न ही उनके चेहरे पर कोई मुस्कान आई। अंततः विक्रम संवत 1515 में उन्होंने अपना मौन तोड़ा और उनके मुख से निकले पहले शब्द गुरु की महत्ता और धर्म की व्याख्या करने वाले थे। 27 वर्षों तक गौ-सेवा और साधारण जीवन व्यतीत करने के बाद, माता-पिता के देहावसान के पश्चात उन्होंने अपनी समस्त संपत्ति लोक कल्याण के लिए दान कर दी और बीकानेर के समराथल धोरा को अपनी तपस्थली बनाया।

विक्रम संवत 1542 में 34 वर्ष की आयु में जम्भोजी ने बिश्नोई संप्रदाय की स्थापना की, जिसका आधार 29 सिद्धांत बने। 'बिश्नोई' शब्द ही 'बीस' और 'नौ' के योग से बना है, जो इन नियमों का पालन करने वालों की पहचान बन गया। उनके इन नियमों में से आठ नियम जैव विविधता और पशु संरक्षण के लिए थे, जबकि अन्य सामाजिक मर्यादा, स्वास्थ्य और आध्यात्मिक उन्नति को समर्पित थे। जम्भोजी ने उस दौर में व्याप्त छुआछूत, जातिवाद, लैंगिक भेदभाव और नशाखोरी जैसी कुरीतियों पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने 'जीव दया पालनी, रूख लीलो नहीं घावे' का अमर संदेश दिया, जिसका अर्थ है कि जीवों पर दया करो और हरे वृक्षों को कभी मत काटो। उन्होंने भगवान विष्णु के 'हरि' नाम के कीर्तन पर बल दिया और मूर्ति पूजा के स्थान पर हवन और सात्विक जीवन को प्राथमिकता दी। उनके द्वारा रचित 120 शब्द आज भी 'शब्दवाणी' के रूप में मानवता का मार्गदर्शन कर रहे हैं, जो पर्यावरण, नैतिकता और मानवीय मूल्यों का अद्भुत संगम है।

गुरु जम्भेश्वर का प्रभाव इतना गहरा था कि उनके अनुयायियों ने वृक्षों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने में भी संकोच नहीं किया, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण खेजड़ली का बलिदान है। उन्होंने मारवाड़ के भीषण अकाल के समय अपनी दैवीय शक्ति और संसाधनों से भूखे लोगों और पशुओं की सेवा की, जिससे उन्हें समाज में एक मसीहा के रूप में प्रतिष्ठा मिली। उन्होंने लगभग 51 वर्षों तक संपूर्ण भारत की यात्रा कर प्रेम और अहिंसा का प्रचार किया। अंततः विक्रम संवत 1593 में लालासर में उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया और मुकाम (बीकानेर) उनकी पावन समाधि स्थली बनी, जहाँ आज भी लाखों श्रद्धालु नतमस्तक होते हैं। गुरु जम्भेश्वर की विरासत आज के वैश्विक संकट और जलवायु परिवर्तन के दौर में और भी प्रासंगिक हो गई है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर ही मानवता सुरक्षित रह सकती है। उनके द्वारा स्थापित आदर्श आज भी बिश्नोई समाज के रग-रग में बसे हैं, जो वन्यजीवों और वृक्षों की रक्षा के लिए दुनिया भर में मिसाल पेश कर रहे हैं।

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