सिख धर्म के गौरवशाली इतिहास में सातवें गुरु के रूप में प्रतिष्ठित गुरु हर राय जी का व्यक्तित्व अध्यात्म, करुणा और राष्ट्रवाद की त्रिवेणी था, जिन्होंने मात्र 14 वर्ष की अल्पायु में 3 मार्च 1644 को अपने दादा गुरु हरगोबिंद साहिब से 'सप्तम नानक' की विरासत संभाली। 1630 ईस्वी में कीरतपुर साहिब में बाबा गुरदित्ता जी और माता निहाल कौर जी के आंगन में जन्मे गुरु साहिब का प्रारंभिक जीवन महान संस्कारों और अदम्य साहस के बीच बीता, जिसका प्रमाण उनके द्वारा सिख योद्धाओं के पुनर्गठन और उनमें नए प्राण फूंकने के प्रयासों में स्पष्ट दिखाई देता है। माता किशन कौर जी के साथ परिणय सूत्र में बंधने वाले गुरु हर राय जी ने अपने जीवन में शांति और अहिंसा को सर्वोपरि माना, किंतु आत्मरक्षा और धर्म की रक्षा के लिए वे सदैव शस्त्रों की महत्ता के प्रति भी सजग रहे। उनके शांत और गंभीर स्वभाव ने जहां जनमानस को प्रभावित किया, वहीं उनकी दूरदर्शी राजनीतिक सोच और राष्ट्र-केंद्रित विचारों ने तत्कालीन मुगल सम्राट औरंगजेब की रातों की नींद उड़ा दी थी। औरंगजेब उन पर दारा शिकोह की सहायता करने का आरोप लगाता था, जो भारतीय जीवन दर्शन और संस्कृत का विद्वान होने के कारण गुरु साहिब के प्रति अटूट श्रद्धा रखता था। गुरु साहिब की अद्वितीय उदारता का ही प्रमाण था कि जब दारा शिकोह एक लाइलाज बीमारी से ग्रस्त होकर मृत्यु के निकट पहुंच गया था, तब गुरु जी द्वारा कीरतपुर में स्थापित आयुर्वेदिक हर्बल चिकित्सा अस्पताल और अनुसंधान केंद्र की औषधियों ने उसे जीवनदान दिया।

गुरु हर राय जी के जीवन में साहस के अध्याय भी उतने ही प्रखर थे जितना उनका आध्यात्मिक पक्ष; जब मालवा और दोआबा की यात्रा के दौरान मोहम्मद यारबेग खान ने एक हजार सैनिकों के साथ उनके काफिले पर अचानक हमला किया, तो गुरु साहिब और उनके सिख योद्धाओं ने अदम्य वीरता का परिचय देते हुए दुश्मन को रणक्षेत्र से भागने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने न केवल सैन्य शक्ति को सुदृढ़ किया बल्कि सामाजिक सुधार की दिशा में भी ऐतिहासिक कदम उठाते हुए 360 'मंजियों' की स्थापना की और भ्रष्ट मसनद प्रणाली को जड़ से मिटाने के लिए सुथरे शाह और भगत भगवान जैसे आध्यात्मिक विभूतियों को कमान सौंपी। उनके कार्यकाल में धीर मल और मिन्हास जैसे तत्वों ने सिख मत के प्रसार में निरंतर बाधाएं उत्पन्न कीं और औरंगजेब ने उन्हें दिल्ली दरबार में तलब किया, जहां गुरु जी ने स्वयं न जाकर अपने पुत्र राम राय को भेजा। किंतु जब राम राय ने मुगल दरबार में गुरुबाणी की त्रुटिपूर्ण व्याख्या कर सिख परंपराओं के स्वाभिमान से समझौता किया, तो गुरु हर राय जी ने राष्ट्र और पंथ की मर्यादा को सर्वोपरि रखते हुए तत्काल अपने पुत्र को पंथ से निष्कासित कर दिया। यह कठोर निर्णय सिख इतिहास में सिद्धांतों के प्रति अटूट निष्ठा का प्रतीक बन गया, जिसने अनुयायियों को यह स्पष्ट संदेश दिया कि गुरु नानक देव जी द्वारा स्थापित सिद्धांतों और गुरु ग्रंथ साहिब की पवित्रता के साथ कोई भी समझौता स्वीकार्य नहीं है।

अपने अंतिम समय का आभास होने पर गुरु हर राय जी ने अपने कनिष्ठ पुत्र गुरु हरकिशन जी को 'अष्टम नानक' के रूप में उत्तराधिकारी नियुक्त किया और 6 अक्टूबर 1661 को कीरतपुर साहिब में ज्योति-जोत समा गए। उनका जीवन इस बात का जीवंत साक्ष्य है कि एक सच्चा आध्यात्मिक मार्गदर्शक न केवल प्रार्थना में लीन रहता है, बल्कि समाज की सेवा, बीमारों का उपचार और अन्याय के विरुद्ध अडिग रहने की सामर्थ्य भी रखता है। गुरु हर राय जी की विरासत आज भी मानवता को करुणा और वीरता के साथ जीने का संदेश देती है, जो सदियों तक भारतीय इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगी।

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