मात्र पाँच वर्ष की अल्पायु में गुरुपद पर आसीन होकर मानवता की सेवा का जो आदर्श गुरु हरकिशन साहिब ने प्रस्तुत किया, वह इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है।

सिख धर्म के आठवें गुरु, श्री गुरु हरकिशन साहिब जी का जन्म विक्रम संवत 1713 में सावन वदी 10 (17 जुलाई, 1656) को कीरतपुर साहिब में हुआ था। गुरु हर राय साहिब और माता किशन कौर के द्वितीय पुत्र के रूप में जन्मे गुरु साहिब का व्यक्तित्व बचपन से ही आध्यात्मिक आभा से परिपूर्ण था। उनके बड़े भाई राम राय को सिख पंथ विरोधी गतिविधियों और मुगल दरबार की चाटुकारिता के कारण गुरुपद से निष्कासित कर दिया गया था, जिसके पश्चात सन् 1661 में गुरु हर राय जी ने मात्र पाँच वर्ष की आयु में गुरु हरकिशन जी को आठवें गुरु के रूप में प्रतिष्ठित किया। इस निर्णय से क्रोधित होकर राम राय ने औरंगजेब से शिकायत की, जिसके परिणामस्वरूप औरंगजेब ने राजा जय सिंह के माध्यम से गुरु साहिब को दिल्ली तलब किया। हालांकि गुरु साहिब पहले अनिच्छुक थे, किंतु सिखों और राजा जय सिंह के विनम्र आग्रह पर उन्होंने दिल्ली प्रस्थान करने का निर्णय लिया। उनकी इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव अंबाला के पास स्थित पंजोखरा गाँव बना, जहाँ उन्होंने अपनी दिव्य शक्ति का परिचय दिया। यहाँ लाल चंद नामक एक पंडित ने एक बालक की क्षमता पर संदेह करते हुए उन्हें गीता के श्लोकों की व्याख्या करने की चुनौती दी। गुरु साहिब ने छज्जू झीवर नामक एक मूक-बधिर और अनपढ़ व्यक्ति के सिर पर अपनी छड़ी स्पर्श की, जिसके प्रभाव से उसने संपूर्ण गीता का सार सुनाकर विद्वानों को स्तब्ध कर दिया; आज इसी स्थान पर ऐतिहासिक गुरुद्वारा श्री पंजोखरा साहिब सुशोभित है।

दिल्ली आगमन पर राजा जय सिंह के महल में उनका भव्य स्वागत हुआ, जहाँ उनकी बुद्धिमत्ता की अनेक कहानियाँ प्रचलित हुईं, जिनमें रानी को दासियों के बीच पहचानना प्रमुख था। उस समय दिल्ली चेचक और हैजे जैसी भीषण महामारियों की चपेट में थी और मुगल शासन जनता के प्रति संवेदनहीन बना हुआ था। ऐसी विषम परिस्थिति में गुरु साहिब ने जाति और धर्म के भेदभाव से ऊपर उठकर रोगियों की सेवा का अभियान चलाया। उनकी निस्वार्थ सेवा से प्रभावित होकर दिल्ली के मुसलमानों ने उन्हें 'बाला पीर' की उपाधि दी। औरंगजेब भी जनमानस के उनके प्रति लगाव को देखकर उनके विरुद्ध कोई कदम नहीं उठा सका। मानवता की सेवा करते हुए गुरु साहिब स्वयं गंभीर ज्वर और चेचक की चपेट में आ गए। अपने अंतिम समय में उन्होंने माता को समीप बुलाकर उत्तराधिकारी के रूप में 'बाबा बकाला' का संकेत दिया, जो भविष्य में नौवें गुरु, श्री गुरु तेग बहादुर जी के रूप में प्रकट हुए। चैत्र सुदी 14, विक्रम संवत 1721 (9 अप्रैल, 1664) को वाहेगुरु का जाप करते हुए वे ज्योति जोत समा गए। उनकी पावन स्मृति में दिल्ली का वह महल आज 'गुरुद्वारा श्री बंगला साहिब' के रूप में विश्वभर के श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है, जहाँ के जल को असाध्य रोगों के निवारण हेतु अत्यंत पवित्र माना जाता है। गुरु गोविंद सिंह जी ने भी अपनी अरदास में उनके प्रताप का वर्णन करते हुए कहा है कि श्री हरकिशन जी का ध्यान करने मात्र से सारे दुख दूर हो जाते हैं।

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