कौन थीं गुलाबो सपेरा? मौत के मुंह से निकलकर पद्मश्री तक का सफर तय करने वाली कालबेलिया नृत्य की वैश्विक पहचान
राजस्थान के कालबेलिया नृत्य को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने वाली गुलाबो सपेरा के जन्म, संघर्ष और कला जगत में उनके ऐतिहासिक योगदान का पूरा विवरण।

राजस्थान के घुमंतू कालबेलिया समुदाय में वर्ष 1970 में जन्मी गुलाबो का जीवन जन्म के पहले घंटे से ही जीवन और मृत्यु के बीच के कड़े संघर्ष का गवाह बन गया था। अपने माता-पिता की सातवीं संतान के रूप में जब उन्होंने इस दुनिया में कदम रखा, तो सामाजिक कुरीतियों और तीन बेटियों के पहले से होने के बोझ तले दबे कुछ परिजनों ने उनके पिता की अनुपस्थिति में उन्हें पैदा होते ही जिंदा दफन कर दिया था। नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था, इसलिए उनकी मौसी ने साहस दिखाते हुए उन्हें एक घंटे बाद जमीन से खोदकर बाहर निकाला और मौत के मुंह से सुरक्षित वापस ले आईं। देवी दुर्गा के अनन्य भक्त उनके पिता ने अपनी इस सबसे छोटी बेटी का नाम 'गुलाबो' रखा और समाज के डर से उसे हमेशा अपनी छत्रछाया में सुरक्षित रखा। जिस समाज ने उन्हें अपनाने से इनकार कर दिया था, उसी समाज की पारंपरिक विरासत यानी कालबेलिया नृत्य को गुलाबो ने अपनी जीने की शक्ति बना लिया। उनके नृत्य की लचक और सपेरों जैसी चपलता ने जल्द ही उन्हें स्थानीय मेलों से निकालकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुँचा दिया।
गुलाबो के जीवन में बड़ा मोड़ तब आया जब उनके हुनर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचाना गया और उन्होंने प्रसिद्ध संगीतकार टीटी रॉबिन के साथ मिलकर कई संगीत परियोजनाओं पर काम किया। उनके जीवन और कला पर फ्रांसीसी लेखकों थिएरी रॉबिन और वेरोनिक गुइलेन द्वारा एक पुस्तक भी लिखी गई, जिसने उनकी ख्याति को यूरोप तक फैला दिया। गुलाबो ने न केवल अपनी कला का प्रदर्शन किया, बल्कि कालबेलिया नृत्य को यूनेस्को की सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल कराने और इसे वैश्विक पहचान दिलाने में अपनी पूरी ऊर्जा लगा दी। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि 2011 में उन्होंने भारत के चर्चित रियलिटी शो 'बिग बॉस' के पांचवें सीजन में भाग लिया, जहाँ उन्होंने अपने जीवन के रोंगटे खड़े कर देने वाले संघर्षों को दुनिया के सामने साझा किया। गुलाबो की इसी तपस्या और भारतीय लोक कला के प्रति उनके समर्पण को देखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2016 में उन्हें देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान 'पद्मश्री' से नवाजा। आज गुलाबो सपेरा का नाम केवल एक नृत्यांगना के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी साहसी महिला के रूप में दर्ज है जिसने रूढ़ियों की बेड़ियाँ तोड़कर अपनी कला के माध्यम से न केवल खुद को बल्कि अपने पूरे समुदाय को एक नई गरिमा और पहचान प्रदान की।

