कौन थे गोविंद गुरु बंजारा? आदिवासियों के मसीहा और मानगढ़ के उस महान क्रांतिकारी की वीरगाथा।
डूंगरपुर में जन्मे समाज सुधारक गोविंद गुरु ने संप सभा और भगत आंदोलन के जरिए आदिवासियों में अलख जगाई और मानगढ़ में ब्रिटिश दमन का सामना किया।

20 दिसंबर 1858 को डूंगरपुर जिले के बासिया गाँव के एक बंजारा परिवार में जन्मे गोविंद गुरु केवल एक आध्यात्मिक संत नहीं थे, बल्कि वे एक दूरदर्शी समाज सुधारक और स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश के जनजातीय क्षेत्रों में क्रांति की नई अलख जगाई। बचपन से ही शिक्षा और अध्यात्म में गहरी रुचि रखने वाले गोविंद गुरु के जीवन में निर्णायक मोड़ तब आया जब वे महर्षि दयानंद सरस्वती के संपर्क में आए और उनके विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र, धर्म और जनजातीय समाज की सेवा में समर्पित कर दिया। उन्होंने वागड़ क्षेत्र को अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाया और एक ऐसे समय में आदिवासियों के भीतर स्वाभिमान का भाव भरा जब वे अशिक्षा और शोषण के अंधकार में डूबे हुए थे। गोविंद गुरु ने बिना किसी सैन्य प्रशिक्षण के केवल ढोल, मंजीरे और भजनों की धुनों के माध्यम से जनचेतना जागृत की और 1890 के दशक में ऐतिहासिक 'भगत आंदोलन' की शुरुआत की, जिसमें अग्नि को पवित्र प्रतीक मानकर हवन और पूजन के जरिए लोगों को एकजुट किया गया। 1883 में उनके द्वारा स्थापित 'संप सभा' ने न केवल शराब, मांस और चोरी जैसी कुरीतियों के त्याग का संदेश दिया, बल्कि मेहनत से सादा जीवन जीने, बच्चों को शिक्षित करने, पंचायतों के माध्यम से विवाद सुलझाने और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का मार्ग भी प्रशस्त किया। धीरे-धीरे लाखों लोग उनके अनुयायी बन गए और मानगढ़ की पहाड़ियों पर होने वाले वार्षिक सम्मेलन ब्रिटिश हुकूमत और सामंती दमन के विरुद्ध प्रतिरोध के गढ़ बन गए। 17 नवंबर 1913 को मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन मानगढ़ की पहाड़ी पर जब लाखों आदिवासी एकत्रित हुए थे, तब ब्रिटिश सेना ने कर्नल शटन के नेतृत्व में क्रूरता की सारी सीमाएं पार करते हुए निहत्थे लोगों पर मशीनगनों और तोपों से हमला कर दिया, जिसमें लगभग 1500 आदिवासी शहीद हो गए, जिसे इतिहास में राजस्थान के जलियांवाला बाग के रूप में जाना जाता है। इस नरसंहार के बाद गोविंद गुरु को गिरफ्तार कर पहले मृत्युदंड और फिर आजीवन कारावास की सजा दी गई, किंतु जेल से मुक्त होने के बाद भी उन्होंने 1931 में अपने अंतिम समय तक लोक सेवा का मार्ग नहीं छोड़ा। अपनी मातृभाषा गौरबोली और राजस्थानी हिंदी में रचित उनके गीत आज भी ब्रिटिश गुलामी को नकारने और अपनी मिट्टी के प्रति प्रेम की गवाही देते हैं। आज उनकी छठी पीढ़ी उनके विचारों को जीवित रखे हुए है और संपूर्ण आदिवासी व बंजारा समाज उन्हें अपना आराध्य मानकर उनकी स्मृति में मानगढ़ और कंबोई की पावन धरती पर नमन करता है। गोविंद गुरु का बलिदान और उनका सामाजिक पुनर्जागरण अभियान भारतीय इतिहास के स्वर्णिम अध्यायों में सदैव अमर रहेगा।

