मध्यकालीन हिंदी साहित्य के स्वर्ण युग में जब भारतीय समाज सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा था, तब एक ऐसी महान आत्मा का प्राकट्य हुआ जिसने अपनी कालजयी लेखनी से सनातन संस्कृति को एक अमर संजीवनी प्रदान की। विक्रम संवत १५६८ या जनमानस में प्रचलित मान्यता के अनुसार ११ अगस्त १४९७ को उत्तर प्रदेश के राजापुर (जिसे वर्तमान में सोरों के नाम से भी आधिकारिक मान्यता प्राप्त है) में जन्मे रामबोला दुबे, इतिहास में गोस्वामी तुलसीदास के नाम से अमर हुए। उन्हें साक्षात् महर्षि वाल्मीकि का अवतार माना जाता है, जिन्होंने त्रेतायुग के रामायण कालीन आदर्शों को तत्कालीन युग की लोकभाषा में ढालकर जन-जन तक पहुँचाया। हुलसी और आत्माराम दुबे के घर जन्मे इस बालक की उत्पत्ति की कथा भी अद्भुत है; पौराणिक साक्ष्यों के अनुसार वह पूरे बारह महीने माता के गर्भ में रहे और जन्म के समय उनके मुख में पूरे बत्तीस दाँत मौजूद थे। नवजात शिशु अमूमन रोते हैं, परंतु इस बालक ने जन्म लेते ही स्पष्ट रूप से 'राम' नाम का उच्चारण किया, जिसके कारण उनका नामकरण 'रामबोला' हुआ। हिंदू ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अभुक्तमूल नक्षत्र में जन्म लेने के कारण पिता के जीवन पर मंडराते संकट को देखते हुए माता-पिता ने अत्यंत भारी मन से जन्म की चौथी रात को ही उन्हें त्याग दिया। इस घोर संकट के समय चुनिया नाम की एक दासी ने बालक को संरक्षण दिया और साढ़े पाँच वर्षों तक उसका लालन-पालन किया, किंतु उसकी मृत्यु के बाद बालक रामबोला पुनः निराश्रित होकर भिक्षाटन करने पर विवश हो गए, जहाँ साक्षात् माता पार्वती द्वारा एक ब्राह्मण स्त्री के रूप में उन्हें नित्य भोजन कराने की लोक मान्यताएँ प्रचलित हैं।

अनाथ और एकाकी जीवन जी रहे रामबोला के जीवन में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब स्वामी रामानंद संप्रदाय के प्रसिद्ध संत नरहरिदास ने उन्हें संरक्षण दिया और वैराग्य की दीक्षा देकर उनका नया नाम 'तुलसीदास' रखा। मात्र सात वर्ष की अल्पायु में अयोध्या के पवित्र तट पर उनका यज्ञोपवीत संस्कार संपन्न हुआ और उन्होंने गुरुमुख से सोरों के शूकरक्षेत्र (वाराह क्षेत्र) में पहली बार भगवान श्रीराम की पावन कथा सुनी, जिसे उन्होंने अपने बाल्यकाल की अज्ञानता के कारण तब पूरी तरह नहीं समझा था। इसके पश्चात् तुलसीदास ने काशी के पंचगंगा घाट पर प्रतिष्ठित परम विद्वान शेष सनातन जी के सानिध्य में रहकर लगभग १५-१६ वर्षों तक संस्कृत व्याकरण, चारों वेदों, वेदांगों, ज्योतिष और षड्दर्शनों का गहन अध्ययन किया। उनके गृहस्थ जीवन को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं; जहाँ महामुनि रामभद्राचार्य जैसे आधुनिक विद्वान विनयपत्रिका और हनुमान बाहुक के आंतरिक साक्ष्यों के आधार पर उन्हें आजीवन बाल ब्रह्मचारी मानते हैं, वहीं दूसरी ओर 'तुलसी प्रकाश' जैसे ग्रंथों के अनुसार विक्रम संवत १६०४ में उनका विवाह पराशर गोत्र के ब्राह्मण दीनबंधु पाठक की सुपुत्री रत्नावली से हुआ था, जिनसे उन्हें तारक नामक एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई जो बाल्यावस्था में ही काल कवलित हो गया। लोक कथाओं के अनुसार, पत्नी के प्रति अगाध मोह के कारण एक बार वह उफनती सरयू नदी को पार कर अपनी ससुराल पहुँच गए, जहाँ रत्नावली की तीखी भर्त्सना और डांट ने उनके भीतर वैराग्य की अग्नि प्रज्वलित कर दी। उन्होंने तुरंत गृहस्थ जीवन का परित्याग कर दिया और प्रयाग को अपना केंद्र बनाकर पूर्ण संन्यासी का जीवन अंगीकार कर लिया।

वैराग्य धारण करने के उपरांत तुलसीदास पुनः काशी लौटे और रामकथा के माध्यम से जनमानस को जाग्रत करने लगे, जहाँ उन्हें एक प्रेत के माध्यम से श्री हनुमान जी का पता चला। हनुमान जी की कृपा से उन्हें चित्रकूट के रामघाट पर भगवान श्रीराम के साक्षात् दर्शन प्राप्त हुए; जहाँ प्रथम बार वह घोड़ों पर सवार दो सुंदर राजकुमारों को पहचान नहीं पाए, वहीं संवत १६०७ की मौनी अमावस्या को भगवान ने बालक रूप में प्रकट होकर उनसे चंदन माँगा। उस समय तुलसीदास पुनः भ्रमित न हों, इसलिए हनुमान जी ने तोते का रूप धारण कर प्रसिद्ध दोहा पढ़ा कि 'चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीर, तुलसीदास चंदन घिसें तिलक देत रघुबीर।' साक्षात् प्रभु के दर्शन पाकर तुलसीदास सुध-बुध खो बैठे और प्रभु श्रीराम ने स्वयं अपने और तुलसीदास के मस्तक पर तिलक लगाकर उन्हें कृतार्थ किया। इसके बाद हनुमान जी की आज्ञा से उन्होंने अयोध्या की यात्रा की, जहाँ संवत १६३१ की रामनवमी के पावन अवसर पर उन्होंने अपने जीवन के सबसे महान ग्रंथ 'श्रीरामचरितमानस' की रचना का श्रीगणेश किया। ब्रजावधि भाषा में लिखे गए इस महाकाव्य को पूर्ण होने में दो वर्ष, सात महीने और छब्बीस दिन का समय लगा।

जब तुलसीदास इस ग्रंथ को लेकर काशी पहुँचे, तो उन्होंने इसे भगवान विश्वनाथ और माता अन्नपूर्णा के चरणों में समर्पित किया, जहाँ मंदिर के कपाट खुलने पर पुस्तक पर स्वयं भगवान शिव के हस्ताक्षरों के साथ 'सत्यम् शिवम् सुंदरम्' अंकित मिला। इस चमत्कार और ग्रंथ की बढ़ती लोकप्रियता से ईर्ष्यालु होकर काशी के कुछ रूढ़िवादी पंडितों ने ग्रंथ को नष्ट करने के उद्देश्य से दो चोर भेजे, परंतु तुलसीदास की कुटिया के बाहर धनुष-बाण लिए दो श्याम और गौर वर्ण के दिव्य युवकों को पहरा देते देख चोरों का हृदय परिवर्तन हो गया और वे परम भक्त बन गए। अंततः इस ग्रंथ की परीक्षा के लिए काशी के विश्वनाथ मंदिर में सबसे ऊपर वेद, फिर शास्त्र, पुराण और सबसे नीचे रामचरितमानस को रखा गया, परंतु सुबह कपाट खुलने पर रामचरितमानस वेदों के ऊपर शीर्ष पर विराजमान मिली, जिससे सभी पंडितों ने नतमस्तक होकर अपनी भूल स्वीकार की। अद्वैत वेदांत के प्रकांड विद्वान मधुसूदन सरस्वती ने भी इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की और सम्राट अकबर के नवरत्नों में से एक अब्दुल रहीम खानखाना ने इसे हिंदुओं के लिए वेद और मुसलमानों के लिए कुरान के समान पवित्र बताया। अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में जब असी घाट पर निवास करते समय कलियुग ने उन्हें शारीरिक व्याधियों से प्रताड़ित किया, तब उन्होंने हनुमान जी की प्रेरणा से अपने अंतिम ग्रंथ 'विनय पत्रिका' की रचना की, जिस पर स्वयं प्रभु श्रीराम ने अपने हस्ताक्षर किए। अंततः संवत १६८० की श्रावण शुक्ल सप्तमी को काशी के असी घाट पर 'राम-राम' कहते हुए यह महान आत्मा पंचतत्व में विलीन हो गई।

गोस्वामी तुलसीदास जी का ऐतिहासिक और सामाजिक प्रभाव अमिट है; उन्होंने अपनी ११२ वर्ष की दीर्घायु में रामचरितमानस, विनयपत्रिका, कवितावली, गीतावली, हनुमान चालीसा, दोहावली और जानकी-मंगल जैसी कुल १२ प्रामाणिक (और कई अन्य) कालजयी कृतियों की रचना की जो सदियों बाद आज भी उतनी ही प्रासंगिक और जीवंत हैं। पाश्चात्य इतिहासकार विन्सेंट स्मिथ ने उन्हें अपने युग का सबसे महान व्यक्ति और यहाँ तक कि सम्राट अकबर से भी महान माना, वहीं सर जॉर्ज ग्रियर्सन ने उन्हें बुद्ध के बाद सबसे बड़ा लोकनायक घोषित किया। महाप्राण निराला ने उन्हें विश्व कविता के उपवन की सबसे सुगंधित शाखा कहा, तो महादेवी वर्मा के अनुसार वर्तमान भारतीय समाज की सुदृढ़ संरचना और हमारे राम की मर्यादा तुलसीदास जी की ही देन है। रूपकों के सम्राट और उपमाओं के बेजोड़ शिल्पी गोस्वामी तुलसीदास ने केवल साहित्य का सृजन नहीं किया, बल्कि बिखरते हुए मध्यकालीन समाज को मर्यादित चरित्र, आपसी समन्वय और अटूट भक्ति का एक ऐसा शाश्वत मार्ग दिखाया, जो आज भी संपूर्ण मानवता का मार्गदर्शन कर रहा है।

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