कौन थे तुलसीदास? जानिए उस कालजयी कवि की कहानी जिसने 'रामचरितमानस' से जन-जन के हृदय में राम को बसा दिया
रामभक्ति शाखा के कवि तुलसीदास का जीवन परिचय, रत्नावली से वैराग्य की घटना और रामचरितमानस के सांस्कृतिक प्रभाव का विस्तृत विवरण।

गोस्वामी तुलसीदास वह दैवीय प्रकाशपुंज थे जिन्होंने कठिन संस्कृत में सिमटे प्रभु राम के पावन चरित्र को अवधी की सरल धारा बनाकर सामान्य जन के द्वार तक पहुँचा दिया।
भारतीय साहित्य और भक्ति परंपरा के शिखर पुरुष गोस्वामी तुलसीदास का जन्म 11 अगस्त 1511 (श्रावण शुक्ल सप्तमी) को उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले के सोरों (शुकरक्षेत्र) में हुआ था, जिसे हाल के वर्षों में चित्रकूट के रूप में भी आधिकारिक मान्यता मिली। आत्मा राम दुबे और हुलसी के घर जन्मे इस बालक का प्रारंभिक जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण और अलौकिक घटनाओं से भरा रहा। जनश्रुति है कि बालक तुलसी (मूल नाम रामबोला) जन्म के समय रोया नहीं, बल्कि उसके मुख से 'राम' शब्द निकला और वह पाँच वर्ष के बालक के समान विकसित दिख रहा था। अशुभ नक्षत्र 'अभुक्तमूल' में जन्म लेने के कारण माता-पिता ने उन्हें त्याग दिया, जिसके बाद दासी चुनिया ने उनका पालन-पोषण किया। अभावों और अनाथ जीवन की ठोकरें खाते हुए उनकी भेंट गुरु नरहरिदास से हुई, जिन्होंने उन्हें 'तुलसीदास' नाम दिया और रामकथा का मर्म समझाया। आगे चलकर शेष सनातन जी के सानिध्य में काशी के पंचगंगा घाट पर उन्होंने वेदों, वेदांगों और दर्शनशास्त्र का गहन अध्ययन किया।
तुलसीदास के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ उनके वैराग्य की घटना है। अपनी पत्नी रत्नावली के प्रति अत्यधिक आसक्ति के कारण जब वे एक रात तूफानी नदी पार कर उनसे मिलने पहुँचे, तो रत्नावली के एक मर्मभेदी उलाहने—"जितनी प्रीति इस हाड़-मांस के देह से है, उतनी यदि श्री राम से होती तो भवसागर पार हो जाते"—ने उनके जीवन की दिशा सदैव के लिए बदल दी। इसके बाद वे विरक्त होकर साधु बन गए और अयोध्या, चित्रकूट व काशी को अपना निवास बनाया। मान्यता है कि उनकी अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर हनुमान जी ने उन्हें दर्शन दिए और उनकी सहायता से चित्रकूट के घाट पर उन्हें साक्षात प्रभु श्री राम के दर्शन प्राप्त हुए। इसी अलौकिक प्रेरणा से वर्ष 1574 (विक्रम संवत 1631) में उन्होंने 'रामचरितमानस' जैसे महाकाव्य की रचना प्रारंभ की, जिसे पूर्ण करने में उन्हें दो वर्ष, सात महीने और छब्बीस दिन लगे।
तुलसीदास केवल एक कवि नहीं, बल्कि एक महान समाज सुधारक और समन्वयवादी विचारक थे। उन्होंने सगुण और निर्गुण, शैव और वैष्णव तथा विभिन्न सामाजिक वर्गों के बीच की दूरियों को पाटकर 'लोक मंगल' का विधान किया। उनकी कृतियों में हनुमान चालीसा, विनय पत्रिका, कवितावली और दोहावली जैसे रत्न शामिल हैं, जो आज भी करोड़ों हिंदुओं की आस्था का आधार हैं। मुग़ल सम्राट अकबर से लेकर महान दार्शनिक मधुसूदन सरस्वती तक उनकी प्रतिभा के कायल थे। 30 जुलाई 1623 को काशी के अस्सी घाट पर इस महान विभूति ने अपना नश्वर शरीर त्याग दिया। तुलसीदास का व्यक्तित्व और कृतित्व आज भी भारतीय संस्कृति की रीढ़ है, क्योंकि उन्होंने राम को केवल एक राजा नहीं, बल्कि मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में स्थापित कर समाज को जीने की एक नई दृष्टि और नैतिकता प्रदान की।

