कौन थे गोपाल कृष्ण गोखले? भारतीय राजनीति के वह 'महात्मा' जिन्होंने गांधी को दी अहिंसा और राष्ट्रवाद की दीक्षा
स्वतंत्रता सेनानी गोपाल कृष्ण गोखले ने सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी की स्थापना कर देश में शिक्षा और संवैधानिक सुधारों की अलख जगाई।

भारत के स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में गोपाल कृष्ण गोखले एक ऐसी असाधारण विभूति थे, जिन्होंने न केवल संवैधानिक सुधारों की नींव रखी, बल्कि भारतीय राजनीति को नैतिकता और शुचिता के आदर्शों से भी संवारा। 9 मई 1866 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के कोटलुक गांव में जन्मे गोखले का प्रारंभिक जीवन कठिन संघर्षों के बीच बीता, लेकिन शिक्षा के प्रति उनके परिवार के अटूट समर्पण ने उन्हें राजाराम कॉलेज और फिर एलफिंस्टन कॉलेज से स्नातक करने का अवसर प्रदान किया। पाश्चात्य राजनीतिक दर्शन और विशेष रूप से जॉन स्टुअर्ट मिल व एडमंड बर्क के विचारों से गहरे प्रभावित गोखले ने अपने गुरु न्यायमूर्ति महादेव गोविंद राणडे के मार्गदर्शन में सामाजिक सुधारों और देश सेवा का संकल्प लिया। वर्ष 1889 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण करने के बाद उनका राजनीतिक कद तेजी से बढ़ा और वे कांग्रेस के भीतर 'नरम दल' के प्रखर प्रवक्ता बनकर उभरे। गोखले का मानना था कि भारत की प्रगति और स्वराज की प्राप्ति केवल संवैधानिक साधनों, निरंतर संवाद और मौजूदा सरकारी संस्थानों के भीतर रहकर काम करने से ही संभव है। उनकी इसी विचारधारा के कारण अक्सर बाल गंगाधर तिलक जैसे 'गरम दल' के नेताओं के साथ उनके वैचारिक मतभेद रहे, जिसका चरम रूप 1907 के ऐतिहासिक सूरत विभाजन के दौरान देखने को मिला। हालांकि, इन मतभेदों के बावजूद गोखले की व्यक्तिगत गरिमा ऐसी थी कि जब तिलक पर हमला हुआ, तो वे स्वयं उनकी सुरक्षा के लिए खड़े हो गए थे।
गोपाल कृष्ण गोखले केवल एक राजनेता ही नहीं, बल्कि एक उच्च कोटि के अर्थशास्त्री और दूरदर्शी शिक्षाविद भी थे। 1905 में जब वे कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित हुए, तब उन्होंने अपनी सबसे महत्वपूर्ण विरासत 'सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी' की स्थापना की। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य ऐसे समर्पित कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करना था जो धार्मिक उत्साह के साथ देश सेवा और शिक्षा के प्रसार में अपना जीवन समर्पित कर सकें। गोखले का दृढ़ विश्वास था कि जब तक भारत की नई पीढ़ी शिक्षित और अपने नागरिक कर्तव्यों के प्रति जागरूक नहीं होगी, तब तक वास्तविक राजनीतिक परिवर्तन संभव नहीं है। उन्होंने केंद्रीय विधान परिषद में बजट पर अपनी अद्वितीय सांख्यिकीय पकड़ और तर्कपूर्ण भाषणों से ब्रिटिश सरकार को भी चकित कर दिया था। इसके साथ ही, भारत में संवैधानिक सुधारों की शुरुआत करने वाले मॉर्ले-मिंटो सुधारों को लाने में उनकी भूमिका अत्यंत निर्णायक रही। उन्होंने न केवल भारत के भीतर बल्कि विदेशों में भी भारतीयों के मानवाधिकारों की रक्षा की, विशेष रूप से दक्षिण अफ्रीका और ब्रिटिश साम्राज्य के अन्य हिस्सों में गिरमिटिया (indentured) मजदूरों के शोषण और अमानवीय प्रथाओं के खिलाफ उनका अभियान ऐतिहासिक था। उनके इन्हीं प्रयासों के कारण अंततः 1920 में इस शोषणकारी प्रथा का अंत हुआ।
गोखले के जीवन का एक सबसे प्रभावशाली अध्याय महात्मा गांधी के साथ उनका गुरु-शिष्य का संबंध है। गांधी जी उन्हें अपना राजनीतिक गुरु और मार्गदर्शक मानते थे। गोखले के ही निमंत्रण पर 1912 में उन्होंने दक्षिण अफ्रीका का दौरा किया था, जहाँ से गांधी जी को भारतीय जनमानस और यहाँ की वास्तविक समस्याओं को समझने की दृष्टि मिली। गांधी जी ने गोखले को "क्रिस्टल जैसा शुद्ध, मेमने जैसा कोमल, शेर जैसा बहादुर और राजनीति के क्षेत्र में सबसे पूर्ण व्यक्ति" कहकर सम्मानित किया था। यद्यपि गोखले ने दो विवाह किए और पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन किया, किंतु उनका अंतिम समय कांग्रेस की एकता और देश के भविष्य की चिंताओं में ही व्यतीत हुआ। 19 फरवरी 1915 को जब उन्होंने अंतिम सांस ली, तो भारत ने एक ऐसा उदारवादी नेता खो दिया जिसने स्वराज की मशाल को तर्क, संयम और बौद्धिक गरिमा के साथ जलाए रखा। गोपाल कृष्ण गोखले का जीवन आज भी हमें सिखाता है कि राष्ट्र निर्माण के लिए केवल विरोध ही नहीं, बल्कि संस्थागत सुधार, शिक्षा और चरित्र की पवित्रता भी अनिवार्य है। उनकी विरासत भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक परंपराओं में आज भी जीवंत है।

