कौन थे गोकुलभाई भट्ट? राजस्थान के गांधी और सिरोही की अस्मिता के रक्षक की गाथा
राजस्थान के एकीकरण और सिरोही के विलय में निर्णायक भूमिका निभाने वाले पद्म भूषण गोकुलभाई भट्ट का जीवन परिचय और उनका सामाजिक योगदान।

राजस्थान के सिरोही जिले के हाथल गाँव में वर्ष 1897 में शिवरात्रि के पावन पर्व पर जन्मे गोकुलभाई भट्ट एक ऐसी विभूति थे, जिन्हें उनकी सादगी और अटूट संकल्प के कारण 'राजस्थान का गांधी' कहा जाता है। उन्होंने महात्मा गांधी के सानिध्य में न केवल देश की आजादी के लिए संघर्ष किया, बल्कि राजस्थान की राजनीतिक और सामाजिक दिशा तय करने में भी निर्णायक भूमिका निभाई। राजस्थान प्रदेश कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष के रूप में उन्होंने संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत किया और रियासती राजनीति के बीच जन-जन की आवाज बने। उनके व्यक्तित्व की दृढ़ता का सबसे बड़ा उदाहरण राजस्थान के एकीकरण के समय देखने को मिलता है, जब उनके अथक प्रयासों और आंदोलनों के कारण ही आबू पर्वत और सिरोही का हिस्सा राजस्थान का अभिन्न अंग बन सका।
आजादी के बाद भी गोकुलभाई का संघर्ष थमा नहीं, बल्कि उन्होंने अपना शेष जीवन गांधीजी के रचनात्मक कार्यों और समाज सेवा के लिए समर्पित कर दिया। वर्ष 1951 के बाद उन्होंने राजस्थान में गांधीवादी मूल्यों को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया और सभी गांधीवादी कार्यकर्ताओं को एक सूत्र में पिरोते हुए 'राजस्थान समग्र सेवा संघ' का गठन किया। इस मंच के माध्यम से उन्होंने प्रदेश में भूदान आंदोलन की मशाल जलाई, जिसके फलस्वरूप 6 लाख बीघा से अधिक भूमि दान में प्राप्त हुई और उसे भूमिहीनों में वितरित कर सामाजिक न्याय की स्थापना की गई। इतना ही नहीं, उन्होंने 315 ग्रामदानी गाँवों का निर्माण कर आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सपना साकार किया। समाज को कुरीतियों से मुक्त करने के लिए उन्होंने शराबबंदी आंदोलन का नेतृत्व किया, जिसके दबाव में सरकार को प्रदेश में शराबबंदी कानून लागू करना पड़ा।
उनकी दूरदर्शिता का प्रमाण जयपुर के दुर्गापुरा में मई 1959 में खरीदी गई वह भूमि है, जहाँ उन्होंने राजस्थान समग्र सेवा संघ के केंद्र के रूप में गांधीवादी विचारों के प्रशिक्षण और विस्तार की नींव रखी। समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण में उनके इन्ही अतुलनीय योगदानों के सम्मान स्वरूप भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 1971 में देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान 'पद्म भूषण' से नवाजा। 6 अक्टूबर 1986 को अपनी अंतिम सांस तक सत्य और अहिंसा के पथ पर चलने वाले गोकुलभाई भट्ट आज भी राजस्थान के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में एक मार्गदर्शक स्तंभ के रूप में जीवित हैं, जिनका जीवन हमें निस्वार्थ जनसेवा और क्षेत्रीय गौरव की रक्षा की निरंतर प्रेरणा देता रहता है।

