राजस्थान की मरुभूमि की रेतीली हवाओं में रची-बसी मांड गायकी को अपनी जादुई आवाज़ से जीवंत करने वाली गवरी देवी लोक संगीत के इतिहास का एक ऐसा अध्याय हैं, जिनकी स्वर-साधना ने सीमाओं के बंधन को तोड़कर वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाई। वर्ष 1920 में जोधपुर की रियासत में जन्मी गवरी देवी को संगीत की विरासत विरासत में मिली थी, क्योंकि उनके माता-पिता बीकानेर राजदरबार के प्रतिष्ठित गायक थे। बचपन से ही राजसी और शास्त्रीय संगीत के वातावरण में पली-बढ़ी गवरी देवी का प्रारंभिक जीवन भले ही सुखद रहा हो, लेकिन नियति ने उनके लिए कुछ और ही मार्ग तय किया था। विवाह के कुछ समय पश्चात ही पति के आकस्मिक देहांत ने उनके जीवन को गहरे शोक और एकाकीपन में धकेल दिया, किंतु इसी विरह और संघर्ष ने उन्हें संगीत की ओर और अधिक गहराई से मोड़ दिया। उन्होंने अपनी पीड़ा को सुरों में पिरोया और संगीत की अनूठी मांड शैली को ही अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। गवरी देवी की आवाज़ में जो खनक और गहराई थी, वह सीधे सुनने वाले के हृदय तक पहुँचती थी, जिससे मांड गायकी की बारीकियाँ और भी निखर उठीं। उनकी प्रतिभा केवल राजस्थान की चौपालों या राजदरबारों तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने अनेक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी प्रस्तुतियों से विदेशी श्रोताओं को भी मंत्रमुग्ध कर दिया। भारत की इस सांस्कृतिक धरोहर को विश्व पटल पर गौरवान्वित करने का श्रेय उन्हें जाता है, जहाँ उन्होंने मरुधरा की मिट्टी की महक और लोक गाथाओं को अपनी गायकी के माध्यम से जीवंत रखा। गवरी देवी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि कैसे एक कलाकार अपने व्यक्तिगत संघर्षों और विडंबनाओं को कला की शक्ति से एक अमर विरासत में बदल सकता है। आज भी जब मांड शैली में केसरिया बालम जैसे गीतों की गूँज सुनाई देती है, तो गवरी देवी का व्यक्तित्व और उनकी साधना एक प्रकाश स्तंभ की भांति उभरती है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए लोक संगीत के संरक्षण और समर्पण की प्रेरणा बनी हुई है।

Pratahkal HQ

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