कौन थे भगवान बुद्ध? शांति और निर्वाण के मार्ग से विश्व को नई दिशा देने वाले 'एशिया के ज्योतिपुंज'
कपिलवस्तु के राजकुमार सिद्धार्थ के त्याग, बोधगया में ज्ञान प्राप्ति और विश्व शांति के लिए दिए गए उनके अष्टांगिक मार्ग के संदेश का विस्तृत विवरण।

सत्य, अहिंसा और करुणा की प्रतिमूर्ति भगवान बुद्ध का जीवन मानवता के लिए एक ऐसी मशाल है जिसने अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर विश्व को शांति का शाश्वत मार्ग दिखाया। ईसा पूर्व 563 में कपिलवस्तु गणराज्य की राजधानी के समीप लुम्बिनी के वनों में राजा शुद्धोधन और रानी महामाया के आंगन में जब बालक सिद्धार्थ का जन्म हुआ, तब किसी ने यह कल्पना नहीं की थी कि राजसी सुखों में पला यह राजकुमार एक दिन समस्त सांसारिक मोह का त्याग कर निर्वाण की खोज में निकल जाएगा। क्षत्रिय शाक्य कुल में जन्मे सिद्धार्थ के जन्म के मात्र सात दिन बाद उनकी माता का देहांत हो गया, जिसके पश्चात उनका पालन-पोषण उनकी मौसी प्रजापति गौतमी ने किया। बचपन से ही सिद्धार्थ का हृदय अत्यंत कोमल और दयालु था; जहाँ अन्य राजकुमार युद्ध कला और आखेट में रुचि रखते थे, वहीं सिद्धार्थ घुड़दौड़ में थकते हुए घोड़ों को देख रुक जाते थे और घायल हंस की रक्षा के लिए अपने चचेरे भाई देवदत्त से भी टकरा जाते थे। उनके पिता ने ऋषि असित की उस भविष्यवाणी के भय से, कि बालक या तो महान सम्राट बनेगा या महान संन्यासी, सिद्धार्थ के चारों ओर सुख-सुविधाओं का एक ऐसा घेरा बना दिया था जिसमें दुख की परछाईं भी न पहुँच सके। गुरु विश्वामित्र से वेदों, उपनिषदों और युद्ध कौशल की शिक्षा लेने के बाद 16 वर्ष की आयु में उनका विवाह यशोधरा से हुआ और कालांतर में उन्हें राहुल नाम के पुत्र की प्राप्ति हुई, किंतु नियति को कुछ और ही स्वीकार था।
राजमहल की विलासिता सिद्धार्थ को अधिक समय तक बांध न सकी और एक दिन नगर भ्रमण के दौरान उन्होंने एक वृद्ध, एक रोगी, एक शव और अंत में एक शांत संन्यासी को देखा। इन दृश्यों ने उनके भीतर जीवन की नश्वरता और दुखों के मूल कारण को जानने की व्याकुलता भर दी और 29 वर्ष की आयु में, एक रात वे अपनी पत्नी, पुत्र और सिंहासन का त्याग कर 'महाभिनिष्क्रमण' पर निकल पड़े। सत्य की खोज में उन्होंने राजगृह में आलार कलाम और उद्रक रामपुत्र से योग और ध्यान सीखा, फिर उरुवेला के जंगलों में छह वर्षों तक कठोर तपस्या की जिससे उनका शरीर जर्जर हो गया। इसी संघर्ष के बीच उन्हें बोध हुआ कि वीणा के तारों को न इतना ढीला छोड़ना चाहिए कि स्वर न निकले और न इतना कसना चाहिए कि वे टूट जाएं; यहीं से उन्होंने 'मध्यम मार्ग' की अवधारणा को आत्मसात किया। अंततः 35 वर्ष की आयु में वैशाख पूर्णिमा की रात गया में निरंजना नदी के तट पर एक पीपल वृक्ष के नीचे उन्हें दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई और वे सिद्धार्थ से 'बुद्ध' बन गए। ज्ञान प्राप्ति के पश्चात बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ में अपने पांच शिष्यों को दिया, जिसे 'धर्मचक्रप्रवर्तन' कहा जाता है। उन्होंने पालि भाषा में चार आर्य सत्यों और अष्टांगिक मार्ग का प्रचार किया, जिसमें अहिंसा, सदाचार और मानसिक शुद्धि पर बल दिया गया।
भगवान बुद्ध ने अपने जीवन के 80वें वर्ष तक निरंतर धर्म का प्रचार किया और ऊंच-नीच के भेदभाव को मिटाकर मानवता को एक सूत्र में पिरोया। उनके प्रभाव से सम्राट अशोक जैसे प्रतापी शासकों ने अस्त्र त्याग कर धम्म का मार्ग अपनाया, जिससे बौद्ध धर्म भारत की सीमाओं को लांघकर चीन, जापान, श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैल गया। कुशीनगर में अपने अंतिम समय में बुद्ध ने निर्वाण प्राप्त किया, जिसे 'महापरिनिर्वाण' कहा जाता है। आज भी बुद्ध के विचार केवल एक धर्म तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे एक ऐसे जीवन दर्शन के रूप में जीवित हैं जो घृणा को प्रेम से और विजय को करुणा से जीतने की शक्ति देते हैं। विश्व इतिहास में उनका व्यक्तित्व एक ऐसे महामानव का है जिन्होंने स्वयं को जानकर संपूर्ण जगत के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया।

