इतिहास के पन्नों में सम्राट अशोक का नाम एक ऐसे प्रतापी शासक के रूप में दर्ज है, जिन्होंने न केवल अपनी तलवार के बल पर साम्राज्य का विस्तार किया, बल्कि अपनी चेतना और मानवीय दृष्टिकोण से मानवता को 'धम्म' का एक शाश्वत संदेश भी दिया। मौर्य वंश के इस महान सम्राट की जीवन यात्रा सत्ता के संघर्ष से शुरू होकर आत्म-साक्षात्कार और लोक-कल्याण के उस शिखर तक पहुँचती है, जहाँ पहुँचकर एक विजेता 'राजर्षि' बन जाता है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में धर्म और उसके स्वरूप की व्यापक चर्चा मिलती है, लेकिन अशोक ने धम्म को केवल शास्त्रों तक सीमित न रखकर उसे जन-जन की जीवनशैली बनाने का प्रयास किया। उनके धम्म का सार किसी विशिष्ट संप्रदाय तक सीमित नहीं था, बल्कि यह मानवीय भावनाओं और नैतिक मूल्यों का एक सार्वभौमिक संग्रह था। सम्राट अशोक का मानना था कि शासन के कार्यों में कितनी भी व्यस्तता क्यों न हो, जब तक लोक-हित की सिद्धि न हो, तब तक संतोष प्राप्त नहीं हो सकता। उनके छठे शिलालेख के अनुसार, वे सर्वलोक-हित को अपना सर्वोच्च कर्तव्य मानते थे और स्वयं को समस्त प्राणियों के प्रति ऋणी समझते थे।

अशोक के धम्म की नीति को समझने का सबसे सटीक माध्यम उनके द्वारा पूरे साम्राज्य में स्थापित कराए गए शिलालेख और स्तंभ लेख हैं। इन अभिलेखों में धम्म को पापहीनता, बहु-कल्याण, आत्म-निरीक्षण, अहिंसा, सत्यवादिता, संयम, कृतज्ञता और सहिष्णुता के रूप में परिभाषित किया गया है। डॉ. स्मिथ और डॉ. राधाकुमुद मुखर्जी जैसे इतिहासकारों ने अशोक के धम्म को एक विश्वजनीन धर्म माना है, क्योंकि इसमें उन सिद्धांतों का समावेश था जो सभी धर्मों का सार हैं। डॉ. रमाशंकर त्रिपाठी के अनुसार, अशोक ने संकुचित सांप्रदायिकता से ऊपर उठकर एक ऐसा नैतिक मार्ग प्रस्तुत किया जो जीवन को शुद्ध और सुखमय बनाने के लिए अपरिहार्य था। उनके दूसरे और सातवें स्तंभ लेख स्पष्ट करते हैं कि धर्म केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि व्यवहार में मधुरता, माता-पिता की आज्ञा का पालन, गुरुजनों का सम्मान और सेवकों के प्रति मानवीय व्यवहार है। उन्होंने जीव हत्या पर कड़ा प्रतिबंध लगाया और चिकित्सा, सड़क निर्माण तथा वृक्षारोपण जैसे सामाजिक कल्याण के कार्यों को धम्म का ही हिस्सा माना।

सम्राट अशोक की धार्मिक नीति उदारता और निष्पक्षता की बेमिसाल मिसाल थी। यद्यपि वे व्यक्तिगत रूप से बौद्ध धर्म के अनुयायी थे, किंतु उन्होंने अन्य संप्रदायों के प्रति कभी अनादर नहीं दिखाया। उनके बारहवें शिलालेख में अंकित है कि जो व्यक्ति अपने संप्रदाय की उन्नति के लिए दूसरे के धर्म की निंदा करता है, वह वास्तव में अपने ही संप्रदाय को गंभीर क्षति पहुँचाता है। इसी धार्मिक सहिष्णुता के कारण उन्होंने गया के निकट बराबर की पहाड़ियों में आजीविक संप्रदाय के भिक्षुओं के लिए गुफाओं का निर्माण करवाया और शैव मंदिरों का जीर्णोद्धार भी किया। उन्होंने 'धम्म-महामात्र' नामक विशेष अधिकारियों की नियुक्ति की, जिनका मुख्य कार्य सभी मतों के बीच सामंजस्य बिठाना और प्रजा के नैतिक उत्थान की निगरानी करना था। उनके लिए प्रजा केवल कर देने वाली जनता नहीं, बल्कि उनकी संतान के समान थी। कलिंग के प्रथम पृथक शिलालेख में उन्होंने स्पष्ट कहा कि "सभी मनुष्य मेरी संतान हैं," और जिस प्रकार एक पिता अपनी संतान के लिए इहलोक और परलोक दोनों की सुख-शांति चाहता है, वैसी ही उनकी कामना समस्त मानव जाति के लिए थी।

अशोक का धम्म 'शुद्ध धर्म' और 'धम्म मंगल' की अवधारणा पर आधारित था, जिसमें दान-पुण्य से अधिक महत्व आत्म-संयम और शुद्ध भावों को दिया गया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि धम्म-दान, धम्म-मित्रता और धम्म-संबंध ही संसार के सर्वश्रेष्ठ संबंध हैं। उन्होंने आडंबरपूर्ण अनुष्ठानों के स्थान पर नैतिकता, दया और अल्प-संग्रह पर बल दिया। सम्राट ने स्वयं को केवल एक प्रशासक नहीं बल्कि एक पथ-प्रदर्शक के रूप में स्थापित किया, जो प्रजा के बीच जाकर उनके सुख-दुख का सहभागी बनता था। उनके शिलालेखों में वर्णित आत्म-बोध और परोपकार की भावना आज भी आधुनिक समाज के लिए उतनी ही प्रासंगिक है जितनी मौर्य काल में थी।

सम्राट अशोक का व्यक्तित्व एक ऐसे सम्राट का है जिसने हिंसा पर अहिंसा की, और विजय पर धर्म की जीत सुनिश्चित की। उनका 'धम्म' किसी मंदिर या मठ की दीवारों में कैद नहीं था, बल्कि वह सड़कों, कुओं, चिकित्सालयों और मानवता के प्रति प्रेम में परिलक्षित होता था। आज सदियों बाद भी सम्राट अशोक का चक्र हमारे राष्ट्रीय ध्वज की शान है और उनके द्वारा दिया गया शांति तथा सहिष्णुता का संदेश वैश्विक सद्भाव का आधार बना हुआ है। उनकी विरासत हमें सिखाती है कि सच्ची महानता साम्राज्य के विस्तार में नहीं, बल्कि जन-कल्याण और नैतिक आचरण के विस्तार में निहित है।

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