कौन थे दुर्गादास राठौर? मारवाड़ के वो महान रक्षक जिन्होंने औरंगज़ेब के अहंकार को झुकने पर मजबूर कर दिया।
औरंगज़ेब के चंगुल से अजीत सिंह को बचाने और मारवाड़ की स्वतंत्रता के लिए 30 वर्षों तक संघर्ष करने वाले महानायक की गाथा।

भारतीय इतिहास के पन्नों में स्वाभिमान, अटूट निष्ठा और अदम्य साहस की जब भी बात होती है, मारवाड़ के रक्षक वीर दुर्गादास राठौर का नाम स्वर्ण अक्षरों में चमकता है। 13 अगस्त 1638 को मारवाड़ के ग्राम सालवा में एक प्रतिष्ठित सूर्यवंशी राठौड़ परिवार में जन्मे दुर्गादास के व्यक्तित्व की नींव उनकी माता नेतकँवर बाई ने रखी थी, जिन्होंने उन्हें बचपन से ही देशप्रेम और आत्मसम्मान के संस्कारों से सींचा। उनके पिता आसकरण सिंह राठौड़ महाराजा जसवंत सिंह के दरबार में मंत्री थे, लेकिन दुर्गादास का पालन-पोषण उनकी माता के संरक्षण में साधारण ग्रामीण परिवेश में हुआ, जिसने उन्हें एक कठोर और दूरदर्शी योद्धा बनाया। उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब दिसंबर 1678 में महाराजा जसवंत सिंह का निधन अफगानिस्तान में हो गया और मुगल सम्राट औरंगज़ेब ने इस शून्य का लाभ उठाकर मारवाड़ पर प्रत्यक्ष कब्ज़ा करने और हिंदू मंदिरों को नष्ट करने की कुटिल चाल चली। जब महाराजा के उत्तराधिकारी शिशु अजीत सिंह का जन्म हुआ, तो औरंगज़ेब ने उन्हें दिल्ली में नज़रबंद कर दिया, लेकिन दुर्गादास ने अपनी जान की परवाह न करते हुए मुगलों के चक्रव्यूह को भेदकर राजकुमार और रानियों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया। इसके बाद शुरू हुआ संघर्ष का वह लंबा दौर, जिसमें दुर्गादास ने लगभग तीन दशकों तक अरावली की दुर्गम पहाड़ियों में रहकर मुगलों के विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध जारी रखा। उन्होंने न केवल मेवाड़ के राणा राज सिंह के साथ मिलकर राजपूत प्रतिरोध को संगठित किया, बल्कि औरंगज़ेब के अपने पुत्र शहजादा अकबर को भी विद्रोह के लिए प्रेरित कर मुगल सत्ता की जड़ें हिला दीं। औरंगज़ेब ने छल-कपट से उन्हें रोकने की हर संभव कोशिश की, यहाँ तक कि उन्हें मारने और गिरफ्तार करने के आदेश भी दिए, लेकिन दुर्गादास की कूटनीतिक चतुरता के सामने शाही सेना सदैव बौनी साबित हुई। उनकी महानता का प्रमाण यह भी है कि उन्होंने औरंगज़ेब की पोती और पोते को अपनी कस्टडी में रखते हुए उन्हें पूर्ण इस्लामिक शिक्षा दिलाने की व्यवस्था की, जो उनके उच्च चारित्रिक मूल्यों को दर्शाता है। वर्ष 1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद दुर्गादास के अथक प्रयासों से अंततः अजीत सिंह जोधपुर के सिंहासन पर विराजमान हुए और मारवाड़ स्वतंत्र हुआ। जीवन के अंतिम वर्षों में महाराजा से मतभेद होने के बावजूद उन्होंने कभी अपनी निष्ठा का मोल नहीं लगाया और शांत भाव से उज्जैन में शिप्रा नदी के तट पर शरण ली। 22 नवंबर 1718 को 81 वर्ष की आयु में इस महानायक का देहांत हुआ, जिनकी छतरी आज भी उज्जैन के चक्रतीर्थ में उनके निस्वार्थ बलिदान की गाथा गाती है।

