कौन थे डूंगजी और जवाहरजी? शेखावाटी के वे अमर सेनानी जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला दीं
शेखावाटी के रिसालदार डूंगर सिंह और जवाहर सिंह के विद्रोह, आगरा जेल से मुक्ति और नसीराबाद छावनी पर हमले की पूरी ऐतिहासिक कहानी।

राजस्थान की वीर प्रसूता भूमि के इतिहास में डूंगजी और जवाहरजी का नाम एक ऐसे शौर्यपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज है, जिसने न केवल ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी बल्कि लोकमानस में स्वतंत्रता की अलख भी जगाई। शेखावाटी ब्रिगेड के पूर्व रिसालदार रहे ठाकुर डूंगर सिंह (डूंगजी) और उनके साथी जवाहर सिंह का विद्रोह महज एक सैन्य असंतोष नहीं था, बल्कि वह विदेशी शासन के हस्तक्षेप और स्थानीय शोषण के विरुद्ध एक संगठित शंखनाद था। यह संघर्ष उस दौर में शुरू हुआ जब शेखावाटी ब्रिगेड की स्थापना शांति के नाम पर स्थानीय शासन में दखल देने के लिए की गई थी, परंतु डूंगजी ने परिस्थितियों को भांपते हुए अपने साथियों के साथ हथियार, ऊंट और घोड़े लेकर विद्रोह कर दिया और अंग्रेजी छावनियों को अपना निशाना बनाना शुरू कर दिया। उनकी वीरता का आलम यह था कि अंग्रेज हुकूमत के साथ-साथ सीकर, जयपुर, बीकानेर और जोधपुर की रियासती सेनाएं भी उन्हें पकड़ने के लिए सक्रिय हो गईं। दुर्भाग्यवश, अपनों के विश्वासघात के कारण उन्हें आगरा के किले में कैद होना पड़ा, लेकिन यह उनके पराक्रम का अंत नहीं बल्कि एक और साहसिक अभियान की शुरुआत थी। लोटू निठारवाल, सावंत मीणा और ठाकुर जवाहर सिंह जैसे जांबाज साथियों ने एक अनोखी योजना बनाई और बारात के छद्म वेश में आगरा कूच किया, जहाँ मुहर्रम के दिन जेल पर अचानक हमला बोलकर डूंगजी को मुक्त करा लिया गया। इस दुस्साहस ने ब्रिटिश अधिकारियों को स्तब्ध कर दिया और उनकी वीरता की गाथा घर-घर पहुँच गई।
जेल से मुक्त होने के बाद डूंगजी और जवाहरजी ने अपनी सैन्य शक्ति को पुनर्गठित किया और राजस्थान के मध्य में स्थित नसीराबाद छावनी पर भीषण हमला बोला। उन्होंने न केवल अंग्रेजी टेंटों और सामान को आग के हवाले किया, बल्कि वहां से प्राप्त धन को प्रसिद्ध देवी मंदिर धनोप में दान कर अपनी जन-कल्याणकारी छवि को पुख्ता किया। अंग्रेजों के लिए यह असहनीय था, जिसके परिणामस्वरूप कर्नल जे. सदरलैंड के नेतृत्व में एक विशाल सेना उनके पीछे लगा दी गई। घड़सीसर गांव में हुए भीषण युद्ध में इन स्वतंत्रता प्रेमियों को घेर लिया गया, जहाँ अंततः कूटनीतिक दबाव और संघर्ष के बीच जवाहर सिंह को बीकानेर की शरण में जाना पड़ा, वहीं डूंगजी जैसलमेर की ओर निकल गए। लंबे संघर्ष के बाद, डूंगजी ने अंततः जोधपुर राज्य के समक्ष आत्मसमर्पण किया और उन्हें जोधपुर दुर्ग में नजरबंद रखा गया, जहाँ उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली। भारत माता कॉलेज की वानर सेना के संरक्षक के रूप में पूजे जाने वाले इन नायकों का सशस्त्र आंदोलन भले ही १९०४ के आसपास शांत हो गया, लेकिन राजस्थान के लोकगीतों और इतिहास के पन्नों में उनकी स्वाधीनता की यह गौरवगाथा आज भी उतनी ही जीवंत है, जो हमें याद दिलाती है कि मातृभूमि की रक्षा के लिए लड़ने वाले कभी मरते नहीं, बल्कि वे आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणापुंज बन जाते हैं।

