केरल के पाला में एक समृद्ध ईसाई परिवार में मर्सी मैथ्यू के रूप में जन्मी एक युवती का सफर जब समाज सेवा की पराकाष्ठा तक पहुँचता है, तो वह 'दया बाई' बन जाती हैं। एक खुशहाल बचपन और ईश्वर में अटूट आस्था रखने वाली मर्सी ने मात्र 16 वर्ष की आयु में नन बनने का निर्णय लेकर घर छोड़ दिया था, लेकिन उनके भीतर मानवता की सेवा का संकल्प इतना गहरा था कि उन्होंने बाद में नन-वस्त्र का त्याग कर दिया ताकि वे भारत के मध्यभाग में रहने वाले वंचित आदिवासी समुदाय के बीच पूरी तरह घुल-मिल सकें। मुक्ति के सिद्धांत को अपने जीवन का आधार बनाने वाली दया बाई ने मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के गोंड समुदाय को अपना परिवार बनाया और बरुल गांव में बस गईं। उनका जीवन व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं का त्याग कर दूसरों के अधिकारों के लिए लड़ने की एक जीवंत मिसाल है, जहाँ उन्होंने न केवल आदिवासियों के हक के लिए आवाज उठाई, बल्कि उन्हें स्वयं सहायता के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाना भी सिखाया। दया बाई ने बिहार, हरियाणा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल के आंतरिक क्षेत्रों में वनवासियों के अधिकारों के लिए लंबी कानूनी और सामाजिक लड़ाइयाँ लड़ीं, साथ ही वे नर्मदा बचाओ आंदोलन और चेंगड़ा संघर्ष जैसे महत्वपूर्ण आंदोलनों का भी अभिन्न हिस्सा रहीं। उनकी निस्वार्थ सेवा का विस्तार केवल भारत तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने बांग्लादेश युद्ध के दौरान भी पीड़ित आम लोगों की सेवा कर अपनी मानवीय संवेदनाओं का परिचय दिया। 90 के दशक के उत्तरार्ध में उन्होंने गरीबी उन्मूलन के लिए स्वयं सहायता समूहों की नींव रखी, जिसके कारण उन्हें स्थानीय बिचौलियों, साहूकारों और प्रभावशाली ग्राम प्रधानों के भारी विरोध और आक्रोश का सामना करना पड़ा, किंतु वे अडिग रहीं। उन्होंने हमेशा प्रशासनिक और बैंक अधिकारियों से गरीबों के उत्थान के लिए संवेदनशील होने का आग्रह किया। दया बाई की कार्यशैली अनूठी है; वे जिस भी गांव में जाती हैं, वहां के लोगों को अपनी देखभाल स्वयं करने हेतु सशक्त बनाती हैं और फिर अगले गांव की ओर प्रस्थान कर जाती हैं। उनकी इसी तपस्या को देखते हुए उन्हें 2007 में 'वनिता वुमन ऑफ द ईयर' और 2012 में 'गुड समैरिटन नेशनल अवार्ड' जैसे सम्मानों से नवाजा गया। उनके जीवन पर आधारित 'ओट्टायल' वृत्तचित्र और फिल्म 'कंथन - द लवर ऑफ कलर' में उनकी मुख्य भूमिका उनके संघर्षपूर्ण जीवन को दुनिया के सामने लाती है। नंदिता दास जैसी हस्तियों के लिए प्रेरणास्रोत बनीं दया बाई आज भी आदिवासियों के बीच एक मसीहा के रूप में जीवित हैं, जिनका जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची आध्यात्मिकता मंदिरों या गिरजाघरों में नहीं, बल्कि शोषितों की सेवा में निहित है।

Pratahkal HQ

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