4 सितंबर 1825 को एक पारसी परिवार में जन्मे दादाभाई नौरोजी, जिन्हें आज भी 'ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया' के नाम से श्रद्धापूर्वक याद किया जाता है, आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद के उन प्रारंभिक स्तंभों में से थे जिन्होंने शिक्षा, समाज सुधार और राजनीति के माध्यम से एक नई चेतना जागृत की। एल्फिंस्टन इंस्टीट्यूट से अपनी शिक्षा पूर्ण करने वाले नौरोजी एक अत्यंत मेधावी छात्र थे और इसी संस्थान में शिक्षक के रूप में अपने करियर की शुरुआत करते हुए वे गणित के प्रोफेसर के पद तक पहुँचे, जो उस दौर में किसी भी भारतीय के लिए शैक्षणिक क्षेत्र में प्राप्त होने वाला सर्वोच्च सम्मान था। उन्होंने केवल अकादमिक जगत तक स्वयं को सीमित नहीं रखा, बल्कि 'स्टूडेंट्स लिटरेरी एंड साइंटिफिक सोसाइटी' जैसी संस्थाओं और मराठी एवं गुजराती ज्ञानप्रसारक मंडलियों के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध बिगुल फूँका। उनके द्वारा स्थापित और संपादित 'रास्ता गफ्तार' पत्रिका उस समय के समाज सुधार आंदोलनों की प्रमुख आवाज़ बनी। उनके जीवन में एक बड़ा मोड़ तब आया जब कामा बंधुओं के निमंत्रण पर वे व्यापार के सिलसिले में इंग्लैंड गए, जिसे उन्होंने केवल व्यवसायिक अवसर नहीं बल्कि भारतीय छात्रों की सहायता और ब्रिटिश प्रशासन के भारतीयकरण के एक सशक्त मंच के रूप में देखा। लंदन प्रवास के दौरान ही वे फिरोजशाह मेहता, महात्मा गांधी और मोहम्मद अली जिन्ना जैसे भविष्य के महानायकों के मार्गदर्शक बने और उनका मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश जनता को भारतीयों पर हो रहे अत्याचारों और गरीबी से अवगत कराना बन गया।

दादाभाई नौरोजी ने महसूस किया कि भारतीय प्रशासनिक सेवा (ICS) में भारतीयों की भागीदारी के बिना सुधार संभव नहीं है, जिसके लिए उन्होंने भारत और इंग्लैंड में एक साथ परीक्षा आयोजित कराने की लंबी लड़ाई लड़ी और 1893 में ब्रिटिश संसद के सदस्य के रूप में इसे स्वीकार कराने में सफलता पाई। वह पहले भारतीय थे जिन्होंने 1892 से 1895 तक ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स के सदस्य के रूप में सेवा की और वहाँ से भारत की आवाज़ बुलंद की। उन्होंने तथ्यों और आंकड़ों के साथ यह सिद्ध किया कि भारत की गरीबी का मुख्य कारण ब्रिटिश शासन की वह व्यवस्था है जो भारत की संपदा का अनवरत दोहन कर रही है। अपनी कालजयी पुस्तक 'पवर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया' में उन्होंने 'धन के निष्कासन' (Drain of Wealth) के सिद्धांत को प्रतिपादित किया और बताया कि कैसे भारत की वार्षिक प्रति व्यक्ति आय मात्र बीस रुपये रह गई है। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि भारत का नैतिक और भौतिक पतन नहीं रुका, तो भारतीय न केवल ब्रिटिश वस्तुओं बल्कि उनके शासन का भी बहिष्कार करेंगे। कांग्रेस के प्रति उनका समर्पण अटूट था और उन्होंने निरंतर अपने पारसी समुदाय को राष्ट्रीय संघर्ष से जुड़ने के लिए प्रेरित किया। उनके जीवन का सबसे ऐतिहासिक क्षण 1906 का कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन था, जहाँ उन्होंने अध्यक्षीय भाषण में पहली बार 'स्वराज्य' की मांग को केंद्र में रखा और न्याय की गुहार लगाई। यद्यपि 30 जून 1917 को उनके निधन के दो महीने बाद ही अगस्त घोषणा के माध्यम से प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी का मार्ग प्रशस्त हुआ, लेकिन उनका असली योगदान उस वैचारिक क्रांति में था जिसने भारतीयों को अपनी दासता की जंजीरों और आर्थिक शोषण को समझने की दृष्टि दी।

दादाभाई नौरोजी का जीवन एक ऐसे तपस्वी की गाथा है जिसने पराधीन भारत की आंखों में स्वराज का सपना बोया और अपनी अंतिम सांस तक उसे सींचने का कार्य किया। उनका व्यक्तित्व और उनकी बौद्धिक ईमानदारी आज भी भारतीय लोकतंत्र और राष्ट्रवाद के लिए एक प्रेरणापुंज है, जो हमें याद दिलाती है कि न्याय की लड़ाई अटूट धैर्य और सत्य के आधार पर ही जीती जा सकती है।

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