गुप्त राजवंश के आकाश में चंद्रगुप्त द्वितीय एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र थे, जिनकी वीरता और कूटनीति ने प्राचीन भारत को उसके गौरव के चरमोत्कर्ष पर पहुँचा दिया। महान सम्राट समुद्रगुप्त के पुत्र के रूप में सत्ता संभालने वाले चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने न केवल अपने पिता से मिले विशाल साम्राज्य को सुरक्षित रखा, बल्कि अपनी आक्रामक विस्तारवादी नीति और दूरदर्शी वैवाहिक संबंधों के माध्यम से इसे एक अखंड और अपराजेय शक्ति में बदल दिया। इतिहास में उनका शासनकाल 'भारत के स्वर्ण युग' के नाम से अंकित है, जहाँ कला, साहित्य और विज्ञान ने नई ऊंचाइयों को छुआ। सांची के शिलालेखों में 'देवराज' और 'प्रवरसेन' जैसे सम्मानजनक नामों से संबोधित चंद्रगुप्त ने उज्जैनी को अपनी दूसरी राजधानी बनाकर साम्राज्य की जड़ों को सुदूर पश्चिम तक मजबूत किया। उनके दरबार की शोभा 'नवरत्न' बढ़ाते थे, जिनमें महाकवि कालिदास, खगोलशास्त्री वराहमिहिर और आयुर्वेद के ज्ञाता धन्वंतरि जैसे दिग्गज शामिल थे, जो उस काल की बौद्धिक संपदा का जीवंत प्रमाण हैं।

चंद्रगुप्त द्वितीय का राज्याभिषेक लगभग 375 ईस्वी में हुआ और उनके शासन की तिथियों का सटीक निर्धारण उनके द्वारा जारी किए गए मथुरा स्तंभ शिलालेख और चांदी के सिक्कों से होता है। उनके पराक्रम की सबसे बड़ी परीक्षा सौराष्ट्र के शक क्षत्रपों के विरुद्ध उनका सैन्य अभियान था। उदयगिरि के गुहा लेख सम्राट की संपूर्ण विश्व को जीतने की महत्वाकांक्षा को स्पष्ट करते हैं। लगभग 20 वर्षों के लंबे संघर्ष के बाद शक शासक रुद्रसिंह तृतीय को परास्त कर उन्होंने न केवल पश्चिमी भारत को विदेशी दासता से मुक्त कराया, बल्कि शक सिक्कों की परंपरा में अपने चांदी के सिक्के जारी कर अपनी विजय को अमर कर दिया। दिल्ली के कुतुब मीनार के पास स्थित लौह स्तंभ पर उत्कीर्ण 'राजा चंद्र' की विजय गाथा, जो बंगाल (वंग) से लेकर बल्ख (वाह्लिक) तक के शत्रुओं के दमन का उल्लेख करती है, अधिकांश विद्वानों के अनुसार चंद्रगुप्त विक्रमादित्य की ही शौर्यगाथा है।

सम्राट की प्रशासनिक कुशलता का ही परिणाम था कि उनका साम्राज्य पूर्व में बंगाल से लेकर उत्तर में बल्ख और उत्तर-पश्चिम में अरब सागर तक विस्तृत था। शासन व्यवस्था को सुगम बनाने के लिए उन्होंने साम्राज्य को 'देश' और 'भुक्ति' जैसी इकाइयों में विभाजित किया था, जहाँ शिखरस्वामी और वीरसेन शाब जैसे योग्य मंत्री और सेनापति नियुक्त थे। उनके शासनकाल की समृद्धि का सजीव वर्णन चीनी यात्री फाह्यान के वृत्तांतों में मिलता है, जिसने तत्कालीन समाज को अत्यंत सुखी, संपन्न और नैतिक बताया था। उस समय दंड विधान अत्यंत उदार थे और लोग चोरी या लूटपाट के भय से मुक्त थे। सोने के सिक्कों की प्रचुरता और कला-वास्तुकला के अभूतपूर्व विकास ने ही भारत को वैश्विक पटल पर 'सोने की चिड़िया' के रूप में स्थापित किया। चंद्रगुप्त विक्रमादित्य का व्यक्तित्व एक विजेता, कुशल प्रशासक और कला के संरक्षक का अद्भुत संगम था, जिनकी विरासत आज भी भारतीय संस्कृति और इतिहास की अमूल्य निधि बनी हुई है।

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