गांधीजी के 'अंतरात्मा के रक्षक' और अपनी बौद्धिक प्रखरता से आधुनिक भारत की दिशा तय करने वाले राजर्षि राजगोपालाचारी का असाधारण जीवन सफर।

भारतीय स्वाधीनता संग्राम और नव-भारत के निर्माण की जब भी चर्चा होती है, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी का नाम एक ऐसे कूटनीतिज्ञ और मनीषी के रूप में उभरता है जिन्होंने अपनी विलक्षण मेधा से इतिहास की धारा बदल दी। 10 दिसंबर 1878 को तमिलनाडु के थोरापल्ली गांव में जन्मे 'राजाजी' बचपन में इतने दुर्बल थे कि उनके माता-पिता को उनके जीवित रहने तक की चिंता सताती थी, लेकिन नियति ने उन्हें एक लंबी और प्रभावशाली आयु बख्शी थी। बेंगलुरु के सेंट्रल कॉलेज और मद्रास प्रेसीडेंसी कॉलेज से कानून की शिक्षा प्राप्त करने के बाद, उन्होंने सलेम में वकालत शुरू की, जहाँ से उनके सार्वजनिक जीवन का उदय हुआ। महात्मा गांधी के सबसे शुरुआती और भरोसेमंद सहयोगियों में शुमार राजाजी ने रॉलेट एक्ट के विरोध से लेकर असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। 1930 में जब गांधीजी ने दांडी मार्च किया, तब राजाजी ने दक्षिण में वेदारण्यम नमक सत्याग्रह का नेतृत्व कर ब्रिटिश हुकूमत को चुनौती दी। उनकी राजनीतिक सूझबूझ का ही परिणाम था कि गांधीजी उन्हें अपनी 'अंतरात्मा का रक्षक' कहते थे।

राजाजी का प्रशासनिक कौशल मद्रास प्रेसीडेंसी के प्रधानमंत्री (1937-39) के रूप में पहली बार दुनिया के सामने आया, जहाँ उन्होंने कृषि ऋण राहत और मद्यनिषेध जैसे क्रांतिकारी कदम उठाए। हालांकि, स्कूलों में हिंदी की अनिवार्यता और बाद के वर्षों में उनकी शिक्षा नीतियों को लेकर उन्हें कड़े विरोध का भी सामना करना पड़ा, जिसे आलोचकों ने जातिगत ढांचे को सुदृढ़ करने वाला बताया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब कांग्रेस ने भारत छोड़ो आंदोलन का बिगुल फूँका, तब राजाजी ने एक अलग और कठिन रास्ता चुना; उन्होंने ब्रिटेन के युद्ध प्रयासों में सहयोग और मुस्लिम लीग के साथ संवाद का समर्थन किया, जिसके कारण उन्हें अपनी ही पार्टी के भीतर विरोध झेलना पड़ा। उनके इसी दृष्टिकोण ने 'सी.आर. फॉर्मूला' को जन्म दिया, जो देश के विभाजन और संवैधानिक गतिरोध को सुलझाने की एक गंभीर कोशिश थी। स्वतंत्रता के समय उन्हें पश्चिम बंगाल का पहला राज्यपाल नियुक्त किया गया और फिर 1948 में उन्होंने लॉर्ड माउंटबेटन के उत्तराधिकारी के रूप में स्वतंत्र भारत के एकमात्र भारतीय गवर्नर-जनरल बनकर इतिहास रचा।

नेहरू मंत्रिमंडल में गृह मंत्री के रूप में कार्य करने के बाद, राजाजी पुनः मद्रास के मुख्यमंत्री बने, लेकिन वैचारिक मतभेदों के चलते उन्होंने 1959 में कांग्रेस से नाता तोड़कर 'स्वतंत्र पार्टी' की स्थापना की। उन्होंने नेहरू की समाजवादी नीतियों और 'लाइसेंस-परमिट राज' का पुरजोर विरोध करते हुए मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था की वकालत की। राजनीति से इतर राजाजी एक उच्च कोटि के साहित्यकार थे; रामायण और महाभारत का उनका पुनर्लेखन आज भी कालजयी माना जाता है, जिसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी नवाजा गया। वह भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' के पहले प्राप्तकर्ताओं में से एक थे। अपने अंतिम दिनों तक परमाणु निशस्त्रीकरण और विश्व शांति के लिए आवाज उठाने वाले राजाजी ने 25 दिसंबर 1972 को 94 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली। एक सामाजिक सुधारक, प्रखर लेखक और निर्भीक राजनेता के रूप में उनका व्यक्तित्व आज भी भारतीय लोकतंत्र के लिए एक मार्गदर्शक स्तंभ की तरह है, जिनकी विरासत सिद्धांतों पर अडिग रहने और बौद्धिक ईमानदारी की प्रेरणा देती है।

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