सनातन संस्कृति के आकाश मंडल में महर्षि भृगु एक ऐसे दैदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनकी मेधा, तप और आध्यात्मिक चेतना ने सृष्टि के विकासक्रम और ज्ञान परंपरा को युगांतरकारी दिशा दी। ब्रह्मा के मानसपुत्र के रूप में अवतरित महर्षि भृगु को प्रजापति होने का गौरव प्राप्त है, जिन्हें सृष्टि के सृजन और विस्तार की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई थी। भृगु नाम की महत्ता इतनी व्यापक है कि इनके वंशजों और उनकी ज्ञान परंपरा को आदरपूर्वक 'भार्गव' कहकर पुकारा जाता है। मानव सभ्यता के आदिपुरुष मनु के समकालीन और परम सखा रहे महर्षि भृगु ने न केवल जीवन के व्यावहारिक नियमों को आकार दिया, बल्कि महान प्रलय के पश्चात ब्रह्मवर्त क्षेत्र में संतों की एक विशाल सभा में मनु के साथ मिलकर 'मनुस्मृति' जैसे कालजयी ग्रंथ के निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दिया। उनका जीवन केवल एक स्थान तक सीमित नहीं रहा; वे बाद में अपने पुत्र च्यवन को धोसी पहाड़ी पर छोड़कर गुजरात में नर्मदा नदी के तट पर स्थित भृगुकच्छ (आधुनिक भरूच) चले गए, जिससे इस क्षेत्र को ऐतिहासिक और आध्यात्मिक पहचान मिली।

महर्षि भृगु का पारिवारिक जीवन भी उतना ही असाधारण और दिव्य था, जितना कि उनका तपस्वी स्वरूप। भागवत पुराण के अनुसार, उनका विवाह कर्दम ऋषि की नौ पुत्रियों में से एक, ख्याति से हुआ था। ख्याति ने भार्गवी के रूप में स्वयं साक्षात देवी लक्ष्मी को पुत्री के रूप में जन्म दिया, जिससे भृगु को साक्षात श्रीहरि के ससुर होने का अलौकिक सौभाग्य मिला। इसके अतिरिक्त उनके धाता और विधाता नाम के दो पुत्र भी हुए। महर्षि भृगु का एक विवाह काव्यामाता से भी हुआ, जिनसे असुरों के परम ज्ञानी गुरु शुक्रदेव का जन्म हुआ, जिन्होंने भगवान शिव से मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त की थी और जिन्हें खगोल विज्ञान में शुक्र ग्रह (वीनस) के रूप में जाना जाता है। ऋषि भृगु और पुलोमा के संसर्ग से च्यवन ऋषि और लोक नायक मृकंड का जन्म हुआ। इसी महान वंश परंपरा में आगे चलकर महर्षि जमदग्नि और उनके पुत्र के रूप में भगवान विष्णु के अत्यंत पराक्रमी अवतार भगवान परशुराम का प्राकट्य हुआ। महर्षि भृगु की उपस्थिति दक्ष प्रजापति के उस ऐतिहासिक महायज्ञ में भी थी, जहाँ उन्होंने शिव को भाग न दिए जाने के कारण आने वाले संकट की चेतावनियों की अनदेखी कर यज्ञ को जारी रखने का समर्थन किया था, जिसका विवरण शिव पुराण और वायु पुराण में मिलता है। वहीं तैत्तिरीय उपनिषद में ब्रह्मज्ञान को लेकर उनके और उनके पिता वरुण के बीच हुआ संवाद आज भी अध्यात्म का मूल आधार माना जाता है, जहाँ वरुण देव ने उन्हें समझाया था कि जिससे सभी जीव उत्पन्न होते हैं, जिसमें जीवित रहते हैं और मृत्यु के बाद जिसमें विलीन हो जाते हैं, वही ब्रह्म है। इसी भार्गवी वारुणी विद्या के बल पर भृगु ने अंतर्मुखी होकर आत्मज्ञान के गूढ़ रहस्यों को सिद्ध किया। श्रीमद्भगवद्गीता में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने ऋषियों में भृगु को अपनी दिव्य विभूति और ऐश्वर्य का प्रतीक बताकर उनके अद्वितीय स्थान को स्वीकार किया है।

सनातन इतिहास में महर्षि भृगु से जुड़ी सबसे विस्मयकारी और रोचक घटना त्रिदेवों—ब्रह्मा, विष्णु और महेश—की परीक्षा लेने की है। सरस्वती नदी के तट पर एकत्रित ऋषियों के बीच जब यह विवाद छिड़ गया कि त्रिदेवों में सबसे श्रेष्ठ और यज्ञ के फल का वास्तविक अधिकारी कौन है, तब इस गुत्थी को सुलझाने का दायित्व सर्वसम्मति से महर्षि भृगु को सौंपा गया। भृगु सबसे पहले सत्यलोक में अपने पिता ब्रह्मा की परीक्षा लेने पहुँचे, जहाँ उन्होंने न तो ब्रह्मा की स्तुति की और न ही उन्हें प्रणाम किया। इस उद्दंडता पर ब्रह्मा क्रोधित हो गए, परंतु अपने पुत्र की मंशा और परीक्षा को भांपकर उन्होंने अपने क्रोध को शांत कर लिया। इसके बाद भृगु कैलाश पर्वत पर भगवान शिव के पास गए। भृगु को देखकर महादेव अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें गले लगाने के लिए आगे बढ़े, लेकिन भृगु ने आलिंगन को अस्वीकार करते हुए शिव को सामाजिक परंपराओं और नियमों का उल्लंघन करने वाला कह दिया। इस अपमान से रुद्र अत्यंत क्रोधित हो उठे और उन्होंने अपना त्रिशूल उठा लिया, परंतु माता पार्वती के हस्तक्षेप और अनुनय-विनय से महादेव शांत हुए। अंत में महर्षि भृगु बैकुंठ लोक में भगवान विष्णु के पास पहुँचे, जहाँ श्रीहरि माता लक्ष्मी की गोद में अपना सिर रखकर विश्राम कर रहे थे। भृगु ने विष्णु को जगाने के लिए क्रोध का अभिनय करते हुए उनके वक्षस्थल पर अपने पैर से प्रहार कर दिया। इस अप्रत्याशित आघात से जागने के बाद भी भगवान विष्णु ने तनिक भी क्रोध नहीं किया, बल्कि अत्यंत विनम्रतापूर्वक ऋषि का स्वागत किया और उनके चरणों को सहलाते हुए कहा कि महर्षि के चरणों के स्पर्श से उनका वक्षस्थल सदैव के लिए पवित्र हो गया है। भगवान विष्णु की इस असीम सहनशीलता, करुणा और महानता को देखकर महर्षि भृगु भावविभोर हो गए और उन्होंने वापस लौटकर ऋषियों के सम्मुख विष्णु को त्रिदेवों में सर्वोपरि घोषित कर दिया। हालाँकि, इस घटना से एक अन्य पौराणिक कथा का जन्म हुआ, जिसके अनुसार माता लक्ष्मी अपने निवास स्थान (विष्णु के वक्षस्थल) पर चरण प्रहार किए जाने से रुष्ट होकर बैकुंठ छोड़कर पृथ्वी पर चली गईं और बाद में भृगु तथा ख्याति की पुत्री भार्गवी या पद्मावती के रूप में अवतरित हुईं, जिसे तिरुपति बालाजी और वेंकटेश्वर की सुप्रसिद्ध गाथा से जोड़ा जाता है।

महर्षि भृगु का जीवन केवल पौराणिक कथाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उनके वंशजों के पराक्रम और संघर्षों की कहानियाँ भी इतिहास में अमर हैं। एक समय जब भृगु की पत्नी पुलोमा गर्भवती थीं और महर्षि स्नान के लिए गए हुए थे, तब पुलोमा नाम का एक असुर वराह रूप धारण कर आश्रम आया और उनका हरण कर ले गया। इस भयावह स्थिति में भय के कारण गर्भपात हो गया, परंतु उस शिशु (च्यवन) की देह से ऐसा प्रखर सूर्य जैसा तेज निकला कि वह असुर तत्काल भस्म हो गया। जब महर्षि भृगु को ज्ञात हुआ कि अग्निदेव ने ही उस असुर को आश्रम का मार्ग बताया था, तो उन्होंने रुष्ट होकर अग्नि को सर्वभक्षी होने का श्राप दे दिया। इसी च्यवन ऋषि और मनु की पुत्री आरुषी के पुत्र के रूप में ओजस्वी महर्षि और्व का जन्म हुआ। राजा कृतवीर्य की मृत्यु के पश्चात जब क्षत्रिय राजाओं ने भार्गव ऋषियों की संपत्ति छीनने के लिए उनके आश्रमों पर आक्रमण किया, तब आरुषी ने अपने गर्भ की रक्षा के लिए उसे अपनी जंघा में छिपा लिया था। क्षत्रियों द्वारा पकड़े जाने पर जब उनकी जंघा से बालक और्व का जन्म हुआ, तो उनके दिव्य तेज से क्षत्रिय राजा अंधे हो गए। बाद में क्षत्रियों द्वारा क्षमा मांगने पर और्व ने उनकी दृष्टि तो लौटा दी, लेकिन क्षत्रियों के प्रति उनका प्रतिशोध कम नहीं हुआ और उनके कठोर तप की अग्नि से संपूर्ण संसार जलने लगा, जिसे बाद में उनके पितरों के करुण निवेदन पर उन्होंने शांत कर समुद्र में विसर्जित कर दिया। महर्षि भृगु का निवास स्थान ब्रह्मवर्त राज्य में दृशद्वती की सहायक वधूसर नदी के तट पर धोसी पहाड़ी के समीप था, जहाँ उनके पुत्र च्यवन ने च्यवनप्राश का आविष्कार किया था। इसके अलावा तमिलनाडु के मरुदेरी, महाराष्ट्र के भुइंज सतारा (जहाँ महर्षि ने समाधि ली थी) और गुजरात के खेडब्रह्मा जैसे अनेक स्थान आज भी उनकी पावन स्मृति को संजोए हुए हैं।

चिकित्सा, खगोल और धर्मशास्त्रों के साथ-साथ महर्षि भृगु का सबसे बड़ा और अमर योगदान फलित ज्योतिष के क्षेत्र में माना जाता है। उन्होंने ब्रह्मांड के रहस्यों और मानव भाग्य की कड़ियों को जोड़ते हुए विश्व के प्रथम ज्योतिष ग्रंथ 'भृगु संहिता' की रचना की। इस महान ग्रंथ में उन्होंने अनगिनत जन्म कुंडलियों और मनुष्यों के भूत, भविष्य तथा वर्तमान का संपूर्ण लेखा-जोखा संकलित किया, जो आज भी ज्योतिष शास्त्र का अचूक और प्रामाणिक स्तंभ माना जाता है। ज्ञान, तपस्या, न्यायप्रियता और भविष्य विज्ञान के आदि प्रणेता के रूप में महर्षि भृगु का ऐतिहासिक और आध्यात्मिक योगदान मानव चेतना के इतिहास में सदैव वंदनीय और अक्षुण्ण रहेगा।

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