श्री धूलीराम की सुपुत्री भगवती देवी का विवाह प्रखर देशभक्त श्री प्यारचंद विश्नोई के साथ हुआ था, जिसके बाद उनके जीवन की दिशा पूरी तरह से राष्ट्र सेवा की ओर मुड़ गई। उनके भीतर छिपी देशप्रेम की अग्नि को हरि भाई किंकर के सानिध्य ने एक नई ऊर्जा दी, जिनसे प्रेरित होकर उन्होंने गोविंदगढ़ में खादी बुनाई का गहन प्रशिक्षण लिया। यह केवल एक कौशल मात्र नहीं था, बल्कि स्वदेशी के संकल्प को जीने की शुरुआत थी। भगवती देवी ने खुद को केवल घर की चहारदीवारी तक सीमित नहीं रखा, बल्कि जन-जन को जागृत करने के लिए पर्चे बांटने, ओजस्वी भाषण देने और अछूतोद्धार जैसे सामाजिक सुधार कार्यों में सक्रिय रूप से जुट गईं। उनका मानना था कि जब तक समाज कुरीतियों से मुक्त नहीं होगा, तब तक सच्ची स्वतंत्रता का कोई मोल नहीं है।

उन्होंने श्री हरिभाऊ जी, श्रीमती रमादेवी और श्री रामनारायण चौधरी जैसे दिग्गज क्रांतिकारियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सत्याग्रहों में भाग लिया और नरेली आश्रम के माध्यम से हरिजन उत्थान के कार्यों को गति दी। उनके संघर्ष की पराकाष्ठा तब देखने को मिली जब भीलवाड़ा में सत्याग्रह के दौरान और कांग्रेस कार्यालय पर गर्व से तिरंगा फहराने के कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उस समय उनकी गोद में एक छोटा बच्चा था, लेकिन मातृभूमि की बेड़ियाँ काटने के संकल्प के आगे ममता की कोमलता कभी बाधा नहीं बनी। जेल की सलाखों के पीछे उन्हें तोड़ने के तमाम प्रयास किए गए और अधिकारियों से माफी मांगकर रिहा होने का लालच भी दिया गया, परंतु उस वीर नारी ने अपने सिद्धांतों और देश की आन से समझौता करने के बजाय कठोर कारावास को चुना। उनका अटूट मनोबल और सिद्धांतों के प्रति अटूट निष्ठा आज भी भारतीय इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है, जो हमें सिखाती है कि राष्ट्र के स्वाभिमान से बड़ा कुछ भी नहीं।

श्रीमती भगवती देवी विश्नोई का जीवन और उनका बलिदान केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि उस युग की नारी शक्ति की अदम्य इच्छाशक्ति का प्रतीक है, जिसने पारिवारिक सुखों का त्याग कर भारत की स्वतंत्रता की नींव को मजबूत किया।

Pratahkal HQ

Pratahkal HQ

Next Story