कौन थे शीतलनाथ जी? जैन धर्म के दसवें तीर्थंकर और शांति व संयम के पुंज
राजा दृढ़रथ के पुत्र भगवान शीतलनाथ ने राजसी सुखों का त्याग कर सम्मेद शिखर से मोक्ष प्राप्त किया, उनकी अहिंसा और संयम की शिक्षाएं आज भी प्रासंगिक हैं।

जैन धर्म के दसवें तीर्थंकर भगवान शीतलनाथ जी का जीवन अध्यात्म, त्याग और लोक कल्याण की एक ऐसी पावन गाथा है जो युगों-युगों तक मानवता को सत्य की राह दिखाती रहेगी।
प्राचीन भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को संजोए हुए तीर्थंकर शीतलनाथ जी का जन्म भद्दिलपुर के इक्ष्वाकु वंशीय राजा दृढ़रथ और माता सुनंदा के यहाँ माघ मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को हुआ था। उनके जन्म से पूर्व ही संपूर्ण राज्य में शीतलता और सुखद वातावरण का संचार होने लगा था, जिसके कारण उनका नाम शीतलनाथ रखा गया। उनका प्रारंभिक जीवन राजसी ठाठ-बाट और वैभव के बीच बीता, किंतु सांसारिक सुखों के प्रति उनके मन में कभी मोह उत्पन्न नहीं हुआ। युवावस्था में उन्होंने प्रजा के हित के लिए शासन की बागडोर संभाली और अपने न्यायप्रिय व शांतिपूर्ण शासन से राज्य में खुशहाली स्थापित की। उनके व्यक्तित्व में एक अनोखी सौम्यता और धैर्य था, जिसने उन्हें जन-जन का प्रिय बना दिया। जीवन के एक निश्चित पड़ाव पर संसार की नश्वरता का बोध होते ही उन्होंने राजसी सुखों का त्याग करने का दृढ़ निश्चय किया और माघ कृष्ण द्वादशी के दिन ही दीक्षा ग्रहण कर आत्म-कल्याण के मार्ग पर निकल पड़े।
दीक्षा के पश्चात उन्होंने कठोर तपस्या और मौन साधना का मार्ग अपनाया, जहाँ उन्होंने अपनी इंद्रियों पर पूर्ण विजय प्राप्त करने के लिए अनेक संघर्ष किए। उनकी साधना इतनी प्रगाढ़ थी कि उन्होंने वर्षों के ध्यान और वैराग्य के बल पर घातिया कर्मों का क्षय किया और अंततः उन्हें केवलज्ञान की प्राप्ति हुई। ज्ञान प्राप्त करने के बाद भगवान शीतलनाथ जी ने 'समवशरण' के माध्यम से धर्म की अमृत वर्षा की और संसार को अहिंसा, संयम और तप का उपदेश दिया। उन्होंने बताया कि आत्मा की वास्तविक शांति बाहरी वैभव में नहीं बल्कि भीतर के विकारों को शांत करने में निहित है। उनकी शिक्षाओं ने न केवल उस समय के समाज को दिशा दी, बल्कि चतुर्विध संघ की स्थापना कर धर्म की जड़ों को और मजबूत किया। उनके जीवन का प्रत्येक अध्याय परोपकार और जीव मात्र के प्रति करुणा से भरा रहा, जो आज भी जैन दर्शन का आधार स्तंभ माना जाता है।
भगवान शीतलनाथ जी का निर्वाण सम्मेद शिखर जी की पावन चोटियों से हुआ, जहाँ से उन्होंने मोक्ष प्राप्त कर जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति पायी। उनका जीवन दर्शन हमें यह सिखाता है कि शक्ति का वास्तविक अर्थ दूसरों पर विजय पाना नहीं, बल्कि स्वयं के क्रोध, मान, माया और लोभ पर नियंत्रण पाना है। आज के इस अशांत युग में शीतलनाथ जी के बताए गए मार्ग और उनकी शांतिपूर्ण विचारधारा की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। उनका दिव्य व्यक्तित्व और उनकी तपस्या का प्रभाव आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा, जो हमें भौतिकता से ऊपर उठकर आत्मिक आनंद की ओर बढ़ने का साहस प्रदान करता है।

