कौन थे मल्लिनाथ जी? जैन धर्म के उन्नीसवें तीर्थंकर और त्याग व वैराग्य के अद्भुत प्रतीक
राजा कुंभ के पुत्र मल्लिनाथ जी के जीवन, श्वेतांबर-दिगंबर मान्यताओं और सम्मेद शिखरजी से उनके मोक्ष गमन का विस्तृत विवरण।

जैन धर्म की समृद्ध आध्यात्मिक परंपरा में उन्नीसवें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ जी का व्यक्तित्व और जीवन दर्शन अत्यंत विशिष्ट और प्रेरणादायी माना जाता है। मिथिला नगरी के इक्ष्वाकु वंशीय राजा कुंभ और रानी प्रभावती (प्राज्ञावती) के आँगन में जन्म लेने वाले इस महान आत्मा का प्रभाव इतना गहरा था कि उन्होंने संसार की नश्वरता और देह की सुंदरता के मोह को त्यागकर मोक्ष मार्ग को प्रशस्त किया। जैन ग्रंथों के अनुसार, मल्लिनाथ जी की ऊंचाई 25 धनुष वर्णित है और उनका जीवनकाल हजारों वर्षों का रहा, जिसमें से एक विशाल खंड उन्होंने 'केवल ज्ञान' यानी पूर्ण बोध की अवस्था में व्यतीत किया। उनके जन्म को लेकर श्वेतांबर और दिगंबर पंथों में अलग-अलग मान्यताएं प्रचलित हैं; जहाँ श्वेतांबर परंपरा उन्हें स्त्री रूप में 'मल्लि कुमारी' मानती है, वहीं दिगंबर परंपरा उन्हें पुरुष तीर्थंकर के रूप में पूजती है, लेकिन इन मतभेदों के परे उनका आध्यात्मिक कद सर्वोपरि है। उनके पूर्ववर्ती तीर्थंकर अरनाथ जी और उनके उत्तराधिकारी मुनिसुव्रतनाथ जी के बीच के कालखंड में उन्होंने सत्य और अहिंसा की ज्योति को प्रज्वलित किया। मल्लिनाथ जी के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब उन्होंने छह राजाओं को शरीर की क्षणभंगुरता का पाठ पढ़ाया और उन्हें वैराग्य की ओर प्रेरित किया, जिसके बाद उन्होंने स्वयं भी कठोर तप का मार्ग चुना। सम्मेद शिखरजी की पावन भूमि पर स्थित 'मल्लिनाथ टोंक' आज भी उनके निर्वाण और सिद्ध पद प्राप्ति की साक्षी है, जहाँ उन्होंने समस्त कर्मों का क्षय कर मोक्ष प्राप्त किया। साहित्य की दृष्टि से 'ज्ञातृधर्मकथा' और नागचंद्र द्वारा रचित 'मल्लिनाथपुराण' उनके जीवन की महिमा का बखान करते हैं, जबकि मन्नारगुड़ी से लेकर कारकल के चतुर्मुख बसदी और गुजरात के भोयणी तक फैले विशाल जैन मंदिर उनके प्रति जनमानस की अटूट श्रद्धा को दर्शाते हैं। मल्लिनाथ जी का जीवन हमें सिखाता है कि भौतिक आकर्षणों से परे आत्मा का कल्याण ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है और उनका त्याग आज भी करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए सन्मार्ग का आधार बना हुआ है।

