भारतीय इतिहास और अध्यात्म के आकाश पर बाबा रामदेव एक ऐसे दैदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिन्होंने चौदहवीं शताब्दी में न केवल भक्ति की अविरल धारा बहाई, बल्कि समाज में व्याप्त ऊंच-नीच और भेदभाव की दीवारों को ढहाकर मानवता का पाठ पढ़ाया। संवत 1409 (1352 ईस्वी) में राजस्थान के जैसलमेर जिले के पोकरण क्षेत्र में एक तंवर राजपूत परिवार में जन्मे रामदेव जी को भगवान श्रीकृष्ण का अवतार माना जाता है। उनके जन्म की कथा राजा अजमल जी तंवर की अटूट भक्ति से जुड़ी है, जिन्होंने पुत्र प्राप्ति की कामना के साथ द्वारकाधीश की शरण ली थी। लोक मान्यताओं के अनुसार, राजा की अनन्य निष्ठा से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान ने उनके घर पुत्र रूप में आने का वरदान दिया, जिसके फलस्वरूप माता मैनादे की कोख से वीरमदेव के अनुज के रूप में बालक रामदेव का प्राकट्य हुआ। बचपन से ही अलौकिक शक्तियों के धनी रामदेव जी का विवाह अमरकोट के सोढा राजपूत दलै सिंह की पुत्री नेतलदे के साथ संपन्न हुआ, लेकिन उनका जीवन सांसारिक सुखों के बजाय जन-कल्याण और दीन-दुखियों की सेवा के प्रति समर्पित रहा।

रामदेव जी के जीवन का सबसे उज्ज्वल पक्ष उनकी सामाजिक समरसता की विचारधारा थी, जहाँ उन्होंने स्पष्ट रूप से यह उद्घोष किया कि ईश्वर की दृष्टि में अमीर-गरीब और ऊंच-नीच का कोई स्थान नहीं है। उन्होंने विशेष रूप से मेघवाल समुदाय और समाज के अन्य वंचित वर्गों को गले लगाया, जिसके कारण आज भी वे अनगिनत समुदायों के इष्टदेव के रूप में पूजे जाते हैं। उनकी ख्याति केवल हिंदू समाज तक सीमित नहीं रही, बल्कि वे सांप्रदायिक सद्भाव के एक महान सेतु बने। जनश्रुतियों के अनुसार, जब मक्का से पांच पीर उनकी शक्तियों की परीक्षा लेने आए, तो बाबा ने अपनी सिद्धियों से उनके वे बर्तन पल भर में मक्का से मंगवा दिए जिन्हें वे वहां भूल आए थे। इस चमत्कार से अभिभूत होकर उन पीरों ने उन्हें 'रामसा पीर' की उपाधि दी और स्वीकार किया कि वे वास्तव में एक महान दिव्य शक्ति हैं। अपने जीवनकाल में कुल 24 प्रमुख चमत्कार (परचा) करने वाले बाबा रामदेव ने पोकरण के समीप रामदेवरा (ऋणीचा) की स्थापना की और वहीं जनसेवा के संकल्प को पूरा किया।

बाबा रामदेव के जीवन की यात्रा मात्र चमत्कारों तक सीमित नहीं थी, बल्कि उन्होंने समाज को एक सूत्र में पिरोने के लिए आध्यात्मिक क्रांति का सूत्रपात किया। अंततः, संवत 1442 (1442 ईस्वी) में भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन उन्होंने रामदेवरा में जीवित समाधि ले ली, जहाँ आज भी उनकी भव्य समाधि स्थित है। उनकी स्मृति में प्रतिवर्ष लगने वाला 'भादवा मेला' भारत के सबसे बड़े अंतरराज्यीय मेलों में से एक है, जहाँ राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, हरियाणा और पंजाब सहित पूरे देश से लाखों श्रद्धालु अपनी आस्था के पुष्प अर्पित करने आते हैं। आज भी बाबा रामदेव का व्यक्तित्व और उनके द्वारा दी गई समानता की शिक्षा समाज के लिए मार्गदर्शक बनी हुई है, जो उन्हें भारतीय लोक संस्कृति और अध्यात्म का एक अमिट स्तंभ बनाती है।

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