मुगल सल्तनत के इतिहास में मुहिउद्दीन मुहम्मद, जिन्हें दुनिया 'औरंगज़ेब' और 'आलमगीर' के नाम से जानती है, एक ऐसी शख्सियत रहे जिन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप के भूगोल और भविष्य दोनों को गहराई से प्रभावित किया। 3 नवंबर 1618 को दाहोद में जन्मे औरंगज़ेब सम्राट शाहजहाँ और मुमताज महल की छठी संतान थे, जिनकी रगों में तैमूर का रक्त दौड़ रहा था। उनका बचपन राजसी सुख-सुविधाओं के बजाय सैन्य अनुशासन और कठिन चुनौतियों के बीच बीता, जिसका प्रमाण मात्र 15 वर्ष की आयु में तब मिला जब उन्होंने एक बेकाबू हाथी का निडरता से सामना किया, जिससे प्रभावित होकर उनके पिता ने उन्हें 'बहादुर' की उपाधि दी। एक राजकुमार के रूप में औरंगज़ेब ने न केवल युद्ध कौशल और प्रशासनिक बारीकियों में महारत हासिल की, बल्कि वे अरबी, फारसी और तुर्की भाषाओं के साथ-साथ इस्लामी धर्मशास्त्र के भी प्रकांड विद्वान बने।

उनका राजनीतिक सफर दक्कन, गुजरात, मुल्तान और सिंध के गवर्नर के रूप में शुरू हुआ, जहाँ उन्होंने अपनी सैन्य प्रतिभा का लोहा मनवाया। हालांकि, 1657 में शाहजहाँ की बीमारी के बाद शुरू हुए उत्तराधिकार के भीषण युद्ध ने उनके जीवन को एक निर्णायक मोड़ दिया। अपने उदारवादी भाई दारा शिकोह, शुजा और मुराद को शिकस्त देकर औरंगज़ेब ने फरवरी 1658 में खुद को सम्राट घोषित किया। इस सत्ता संघर्ष में उन्होंने न केवल अपने भाइयों का अंत किया, बल्कि अपने पिता शाहजहाँ को भी आगरा के किले में नजरबंद कर दिया। 1659 में दिल्ली में उनके औपचारिक राज्याभिषेक के साथ एक ऐसे युग की शुरुआत हुई, जिसमें मुगल साम्राज्य अपनी भौगोलिक सीमाओं के चरम पर पहुँच गया, जो काबुल से लेकर चटगांव और कश्मीर से लेकर कावेरी नदी तक फैला था।

औरंगज़ेब का शासनकाल निरंतर युद्धों और सैन्य अभियानों का साक्षी रहा। उनके नेतृत्व में मुगलों ने मराठों, सिखों, जाटों, राजपूतों और अहोम साम्राज्य के साथ लंबे संघर्ष किए। उन्होंने बीजापुर और गोलकुंडा की रियासतों को जीतकर दक्षिण भारत पर मुगल ध्वज फहराया, लेकिन मराठा छत्रपति शिवाजी महाराज और बाद में उनके उत्तराधिकारियों के साथ शुरू हुआ 'दक्कन का युद्ध' उनके साम्राज्य के लिए आर्थिक और सैन्य रूप से बेहद महंगा साबित हुआ। एक कट्टर रूढ़िवादी मुस्लिम शासक के रूप में, औरंगज़ेब ने प्रशासन में शरीयत को प्राथमिकता दी और 'फतावा-ए-आलमगीरी' जैसे कानूनी संकलन तैयार करवाए। उन्होंने संगीत और दरबारी विलासिता को त्याग कर एक तपस्वी जैसा जीवन जिया, लेकिन उनकी धार्मिक नीतियों, जैसे जजिया कर का दोबारा लागू किया जाना और कुछ प्रमुख मंदिरों का विध्वंस, आज भी इतिहासकारों के बीच तीखी बहस का विषय है। उनके काल में भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना, जिसका वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 25 प्रतिशत का योगदान था।

अपने शासन के अंतिम 26 वर्ष औरंगज़ेब ने दक्कन के युद्ध के मैदानों में ही बिताए। उम्र के नौवें दशक में पहुँचने के बावजूद वे व्यक्तिगत रूप से सेना का संचालन करते रहे, लेकिन निरंतर विद्रोहों और गिरती अर्थव्यवस्था ने साम्राज्य की नींव कमजोर कर दी थी। 3 मार्च 1707 को अहमदनगर के पास भिंगार में 88 वर्ष की आयु में इस शक्तिशाली सम्राट का निधन हुआ। अपनी वसीयत के अनुसार, उन्हें बेहद सादगी के साथ महाराष्ट्र के खुल्दाबाद में एक खुली कब्र में दफनाया गया। औरंगज़ेब की मृत्यु के साथ ही मुगल साम्राज्य के पतन का वह दौर शुरू हुआ जिसने अंततः भारत में औपनिवेशिक शक्तियों के उदय का मार्ग प्रशस्त किया। वे एक ऐसे सम्राट के रूप में याद किए जाते हैं जिनके पास अदम्य साहस और प्रशासनिक दृढ़ता तो थी, लेकिन उनके कठोर आदर्शों और अंतहीन युद्धों ने उस विशाल साम्राज्य को ढलान पर ला खड़ा किया जिसे उनके पूर्वजों ने सदियों में संवारा था।

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