प्राचीन भारत के गौरवशाली इतिहास में जब विज्ञान और गणित अपनी पराकाष्ठा पर थे, तब एक ऐसी विभूति का उदय हुआ जिसने न केवल पृथ्वी की गति के रहस्यों को सुलझाया, बल्कि आधुनिक गणित की आधारशिला भी रखी। महान खगोलशास्त्री और गणितज्ञ आर्यभट्ट का जन्म शक संवत 398 यानी ईस्वी सन् 476 में हुआ था। उनके जन्मस्थान को लेकर इतिहासकारों में रोचक बहस रही है; जहाँ उन्होंने स्वयं अपने ग्रंथ 'आर्यभटीय' में कुसुमपुर को अपनी कर्मभूमि बताया है, जिसे आधुनिक पटना माना जाता है, वहीं नवीन शोध उनके मूल को महाराष्ट्र के अश्मक क्षेत्र या केरल के चाम्रवट्टम से जोड़ते हैं। माना जाता है कि वे भट्ट ब्रह्मभट्ट ब्राह्मण समुदाय से थे और अपनी मेधा को सही मंच देने के लिए उन्होंने तत्कालीन मगध साम्राज्य की राजधानी कुसुमपुर की लंबी यात्रा की। यह वह दौर था जब गुप्त साम्राज्य अपने अंतिम चरण में था और भारत 'स्वर्ण युग' की आभा से दीप्तिमान था। आर्यभट्ट की विद्वत्ता का सम्मान करते हुए उन्हें नालंदा विश्वविद्यालय का कुलपति बनाया गया, जहाँ उन्होंने वेधशालाओं के बीच बैठकर आकाश के उन रहस्यों को खंगाला जिन्हें सदियों बाद पश्चिमी वैज्ञानिकों ने स्वीकारा।

आर्यभट्ट ने अपनी कालजयी कृति 'आर्यभटीय' के माध्यम से गणित और खगोलशास्त्र के जटिल सिद्धांतों को मात्र 121 श्लोकों में समाहित कर दिया। उन्होंने उस दौर में पृथ्वी की परिधि की गणना 39,968 किलोमीटर की थी, जो आधुनिक गणना के बेहद करीब है। उनकी सबसे क्रांतिकारी खोज यह थी कि पृथ्वी स्थिर नहीं है, बल्कि अपनी धुरी पर घूमती है; उन्होंने नाव में बैठे व्यक्ति का उदाहरण देकर समझाया कि जैसे चलते हुए नाविक को किनारे के स्थिर वृक्ष पीछे भागते नजर आते हैं, वैसे ही घूमती पृथ्वी से हमें स्थिर तारे चलते हुए प्रतीत होते हैं। उन्होंने सदियों से चली आ रही राहु-केतु की पौराणिक कथाओं को दरकिनार कर चंद्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण का वैज्ञानिक आधार स्पष्ट किया कि ये केवल पृथ्वी और चंद्रमा की छाया का खेल हैं। गणित के क्षेत्र में उन्होंने 'पाई' ($-pi$) का मान 3.1416 प्रतिपादित किया और शून्य के सिद्धांत को स्थानीय मान पद्धति में इस प्रकार पिरोया कि गणना करना सुगम हो गया। उनके द्वारा प्रतिपादित 'कुट्टक' विधि आज भी आधुनिक बीजगणित और क्रिप्टोलोजी में महत्वपूर्ण मानी जाती है।

आर्यभट्ट का प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उनके कार्यों के अरबी अनुवाद के माध्यम से यह ज्ञान इस्लामी जगत और फिर यूरोप तक पहुँचा। आज हम जिसे 'साइन' और 'कोसाइन' कहते हैं, वह वास्तव में आर्यभट्ट के 'ज्या' और 'कोज्या' का ही परिवर्तित रूप है। उनके सिद्धांतों ने न केवल हिंदू पंचांग को सटीक बनाया, बल्कि ईरान के जलाली कैलेंडर की भी नींव रखी। उनकी विरासत को अक्षुण्ण रखने के लिए स्वतंत्र भारत ने अपने पहले उपग्रह का नाम 'आर्यभट्ट' रखा और चंद्रमा पर एक क्रेटर भी उनके नाम से सुशोभित है। संघर्षों और सीमित संसाधनों के बीच आर्यभट्ट ने जो वैज्ञानिक क्रांति शुरू की, उसने भारत को विश्व गुरु के पद पर प्रतिष्ठित किया। उनकी खोजें आज भी हमें यह याद दिलाती हैं कि सत्य केवल तर्क और अवलोकन से ही प्राप्त किया जा सकता है।

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