कौन थीं अरुणा रॉय? नौकरशाही की चमक छोड़कर लोकतंत्र के 'सूचना के अधिकार' की नींव रखने वाली एक साहसी जननेत्री
प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा देकर राजस्थान के गांवों में सामाजिक न्याय की अलख जगाने वाली अरुणा रॉय और सूचना के अधिकार कानून के सफर की पूरी कहानी।

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में अरुणा रॉय का नाम उस असाधारण व्यक्तित्व के रूप में दर्ज है, जिन्होंने व्यवस्था के भीतर रहकर उसकी कमियों को पहचाना और फिर उसी व्यवस्था को जवाबदेह बनाने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। 6 जून 1946 को मद्रास प्रेसीडेंसी के एक प्रबुद्ध तमिल ब्राह्मण परिवार में जन्मी अरुणा के पालन-पोषण में जातिगत रूढ़िवादिता के बजाय मानवतावादी और लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रभाव अधिक रहा। उनके माता-पिता, हेमा और ई.डी. जयराम, सार्वजनिक सेवा और प्रगतिशील विचारों के समर्थक थे, जिसका गहरा असर अरुणा की सोच पर पड़ा। उनकी शिक्षा चेन्नई के प्रसिद्ध कलाक्षेत्र अकादमी और दिल्ली के इंद्रप्रस्थ कॉलेज जैसे संस्थानों में हुई, जहाँ उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में महारत हासिल की। वर्ष 1967 में, मात्र 21 वर्ष की आयु में अरुणा ने भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) जैसी कठिन परीक्षा अपने पहले ही प्रयास में उत्तीर्ण की, जो उस दौर में किसी भी महिला के लिए एक क्रांतिकारी उपलब्धि थी। एक आईएएस अधिकारी के रूप में उन्होंने दिल्ली और तमिलनाडु के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी सेवाएं दीं, लेकिन सात वर्षों के इस कार्यकाल ने उन्हें व्यवस्था की एक कड़वी सच्चाई से रूबरू कराया। उन्होंने महसूस किया कि नौकरशाही पदानुक्रम और औपनिवेशिक मानसिकता में जकड़ी हुई है, जहाँ एक ईमानदार अधिकारी के पास अक्सर मौन रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। भ्रष्टाचार केवल पैसों का लेनदेन नहीं बल्कि जनविरोधी निर्णयों को थोपना भी था। अंततः, सामाजिक न्याय की अपनी प्रतिबद्धता को पूरा करने के लिए उन्होंने एक साहसिक निर्णय लिया और 1974 में अपने पद से इस्तीफा देकर राजस्थान के तिलोनिया गाँव की ओर रुख किया।
तिलोनिया में अपने पति संजीत 'बंकर' रॉय द्वारा स्थापित 'बेयरफुट कॉलेज' से जुड़कर अरुणा ने ग्रामीण जीवन की जटिलताओं को करीब से समझा। शहरी सुख-सुविधाओं को त्याग कर उन्होंने मिट्टी के घरों में रहकर दलितों और वंचितों के अधिकारों की लड़ाई लड़ी। यहाँ उन्होंने सीखा कि ग्रामीण जनता अशिक्षित भले हो सकती है, लेकिन वह अज्ञानी नहीं है; उनके पास अपना पारंपरिक ज्ञान और असाधारण बुद्धिमत्ता है। 1983 में बेयरफुट कॉलेज छोड़ने के बाद, उन्होंने कुछ वर्षों तक राजस्थान के विभिन्न आदिवासी समूहों के साथ काम किया और अंततः 1990 में शंकर सिंह और निखिल डे के साथ मिलकर 'मजदूर किसान शक्ति संगठन' (MKSS) की नींव रखी। देवडूंगरी के एक छोटे से कच्चे कमरे से शुरू हुआ यह आंदोलन जल्द ही भारत के सबसे प्रभावशाली जन आंदोलनों में से एक बन गया। अरुणा रॉय के नेतृत्व में एमकेएसएस ने 'हमारा पैसा, हमारा हिसाब' का नारा बुलंद किया, जिसने आगे चलकर ऐतिहासिक 'सूचना के अधिकार' (RTI) आंदोलन का रूप लिया। उन्होंने जन-सुनवाइयों के माध्यम से भ्रष्टाचार को उजागर किया और साबित किया कि सरकारी खर्च का विवरण जानने का अधिकार ही आम नागरिक की असली शक्ति है। उनके अथक प्रयासों का ही परिणाम था कि 2005 में 'सूचना का अधिकार अधिनियम' कानून बना। इसके अतिरिक्त, उन्होंने 'मनरेगा' (NREGA) और 'भोजन के अधिकार' जैसे महत्वपूर्ण कानूनों को अमली जामा पहनाने में भी निर्णायक भूमिका निभाई। अरुणा रॉय को उनके सामुदायिक नेतृत्व के लिए 'रमन मैग्सेसे पुरस्कार' और 'लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय पुरस्कार' सहित दुनिया के कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। आज भी वह पेंशन परिषद और व्हिसलब्लोअर सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सक्रिय रहकर भारतीय लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत कर रही हैं, और उनका जीवन इस बात का जीवंत उदाहरण है कि एक व्यक्ति का अटूट संकल्प

