राजस्थान में स्वतंत्रता आंदोलन के जनक माने जाने वाले श्री अर्जुन लाल सेठी का जन्म 9 सितंबर 1880 को जयपुर के एक जैन परिवार में हुआ था। मेधावी छात्र रहे सेठी जी ने वर्ष 1902 में फारसी विषय के साथ स्नातक की उपाधि प्राप्त की, जिसके बाद उन्हें जयपुर राज्य में 'कामदार' के महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त किया गया। हालांकि, उनके भीतर जल रही देशभक्ति की ज्वाला ने उन्हें लंबे समय तक प्रशासनिक सुखों में बंधने नहीं दिया। अंग्रेजों के भारतीयों के प्रति अपमानजनक व्यवहार और दमनकारी नीतियों से विचलित होकर उन्होंने जल्द ही राजकीय सेवा को त्याग दिया और अपना संपूर्ण जीवन मातृभूमि की मुक्ति के लिए समर्पित कर दिया। वर्ष 1905 से 1912 के मध्य वे क्रांतिकारी गतिविधियों में अत्यंत सक्रिय रहे और इसी दौरान उन्होंने राजस्थान में कांग्रेस पार्टी और जयपुर प्रजामंडल की नींव रखकर राजनीतिक चेतना का प्रसार किया।

सेठी जी का प्रभाव केवल राजनीति तक सीमित नहीं था; उन्होंने शिक्षा को क्रांति का माध्यम बनाया। जब वे इंदौर के कल्याणमल महाविद्यालय में प्रधानाध्यापक के रूप में कार्यरत थे, तब उन्हें उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद उन्हें जयपुर और वेल्लोर की जेलों में वर्ष 1922 तक करीब छह वर्षों तक नजरबंद रखा गया। जेल में उनके साथ हुए दुर्व्यवहार और उनके अडिग सिद्धांतों की चर्चा पूरे देश में फैल गई। जैन तीर्थंकर की मूर्ति की पूजा किए बिना अन्न ग्रहण न करने के अपने संकल्प के कारण उन्होंने जेल में ही 70 दिनों तक लंबा उपवास किया, जिसने ब्रिटिश प्रशासन की जड़ें हिला दीं। उनकी रिहाई के लिए देश के विभिन्न प्रांतों के समाचार पत्रों और एनी बेसेंट जैसे दिग्गज नेताओं ने पुरजोर आवाज उठाई, यहाँ तक कि एनी बेसेंट ने इस विषय पर वायसराय से भी मुलाकात की।

एक क्रांतिकारी, ओजस्वी वक्ता और दूरदर्शी शिक्षक के रूप में अर्जुन लाल सेठी का योगदान अतुलनीय रहा। उन्होंने न केवल राजस्थान में संगठित आंदोलनों की शुरुआत की, बल्कि युवाओं में राष्ट्रवाद का ऐसा बीज बोया जिसने आगे चलकर आजादी की लड़ाई को गति प्रदान की। जीवन के अंतिम पड़ाव में वे अजमेर चले गए, जहाँ 22 दिसंबर 1941 को 61 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उनके निधन के बाद उनकी इच्छा और जीवन की सादगी के अनुरूप उन्हें वहीं दफनाया गया। आज भी अर्जुन लाल सेठी का नाम राजस्थान के इतिहास में एक ऐसे महानायक के रूप में दर्ज है, जिसने अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया और आने वाली पीढ़ियों के लिए त्याग और साहस की एक अविस्मरणीय विरासत छोड़ गए।

Pratahkal HQ

Pratahkal HQ

Next Story