राखीगढ़ी के कंकाल खोलेंगे हजारों साल पुराने राज; ASI ने शुरू की जांच
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने हरियाणा के राखीगढ़ी स्थल से प्राप्त प्राचीन मानव कंकालों को डीएनए और बहुविषयक वैज्ञानिक विश्लेषण के लिए सौंप दिया है।

हरियाणा के राखीगढ़ी पुरातात्विक स्थल पर कब्रिस्तान टीला संख्या 7 से मानव कंकाल अवशेषों को वैज्ञानिक विश्लेषण के लिए सावधानीपूर्वक बाहर निकालते पुरातत्वविद।
Rakhigarhi human skeleton remains ASI : हरियाणा के हिसार जिले में स्थित ऐतिहासिक राखीगढ़ी पुरातात्विक स्थल की धरती ने एक बार फिर इतिहास के पन्नों में हलचल पैदा कर दी है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने राखीगढ़ी से हाल ही में उत्खनन के दौरान प्राप्त हुए प्राचीन मानव कंकाल अवशेषों को एक बड़े वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए आधिकारिक तौर पर भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण (एएनएसआई) को सौंप दिया है। इस संवेदनशील और ऐतिहासिक हस्तांतरण के बाद अब देश के शीर्ष वैज्ञानिक इन कंकालों की मदद से सिंधु-सरस्वती सभ्यता के उन अनसुलझे रहस्यों को खंगालने की तैयारी में हैं, जो पिछले कई हजार सालों से जमीन के नीचे दफन थे। यह महाजांच केवल इतिहास को समझने का जरिया नहीं है, बल्कि यह दक्षिण एशिया के प्राचीन मानव विकास, उनके वंश और प्रवास की पूरी कहानी को एक नया मोड़ देने की क्षमता रखती है, जिसने देश-दुनिया के इतिहासकारों और पुरातत्वविदों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।
इस बड़े घटनाक्रम की पुष्टि करते हुए भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण के निदेशक प्रोफेसर बी.वी. शर्मा ने बताया कि दोनों शीर्ष राष्ट्रीय संस्थानों के बीच हाल ही में एक उच्च स्तरीय समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए थे। इसी कानूनी और आधिकारिक समझौते के वैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत इन ऐतिहासिक अवशेषों का हस्तांतरण सुनिश्चित किया गया है। लगभग 550 हेक्टेयर के विशाल भूभाग में फैला हरियाणा का राखीगढ़ी क्षेत्र वर्तमान में सिंधु-सरस्वती सभ्यता की सबसे बड़ी ज्ञात बस्ती के रूप में वैश्विक स्तर पर स्थापित है। यहां हुए अब तक के उत्खनन इस बात का पुख्ता प्रमाण देते हैं कि इस स्थल पर प्रारंभिक हड़प्पा काल से लेकर परिपक्व हड़प्पा काल तक इंसानों की निरंतर बसावट रही थी। इस प्राचीन महानगर में सुनियोजित बस्तियां, उत्कृष्ट जल निकासी व्यवस्था, बड़े शिल्प उत्पादन केंद्र, सुदूर देशों तक फैले व्यापार नेटवर्क और सुनियोजित कब्रिस्तान मौजूद थे, जो इसके एक अत्यंत विकसित शहरी केंद्र होने की गवाही देते हैं।
अनुसंधान की कड़ियों को जोड़ते हुए अधिकारियों ने बताया कि वर्ष 2025-26 के हो रहे क्षेत्र सत्र के दौरान ग्रेटर नोएडा स्थित भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की उत्खनन शाखा-II द्वारा यहां एक विस्तृत खुदाई अभियान चलाया गया था। इसी उत्खनन के दौरान पुरातत्वविदों को टीला संख्या 7 में बड़ी सफलता हाथ लगी, जिसे प्राचीन काल के कब्रिस्तान के रूप में चिन्हित किया गया है। वैज्ञानिकों ने इस कब्रिस्तान से आठ प्राचीन कब्रों को सफलतापूर्वक खोज निकाला। इन कब्रों से प्राप्त तीन पूर्ण मानव कंकालों को, अन्य कब्रों से मिले कंकाल के टुकड़ों और अस्थि अवशेषों के साथ, विस्तृत वैज्ञानिक विश्लेषण के लिए कोलकाता स्थित भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण के प्राचीन मानव कंकाल भंडार और परिष्कृत प्रयोगशाला में सुरक्षित रूप से स्थानांतरित कर दिया गया है। पुरातात्विक सूत्रों के अनुसार, इस स्थल से उत्खनन में मिली शेष अन्य कंकाल सामग्रियों को भी आगामी कुछ दिनों के भीतर पूरी वैधानिक प्रक्रियाओं के साथ कोलकाता लैब भेज दिया जाएगा।
इतिहास के इस सबसे बड़े वैज्ञानिक अन्वेषण को अंजाम देने के लिए देश-विदेश की कई नामचीन संस्थाएं एक साथ काम कर रही हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि राखीगढ़ी से मिले ये अवशेष आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों को परखने का एक अत्यंत दुर्लभ और स्वर्णिम अवसर प्रदान करते हैं। इन कंकालों पर प्राचीन डीएनए (एडीएनए) विश्लेषण, स्टेबल आइसोटोप स्टडी, अत्याधुनिक अस्थिविज्ञान संबंधी आकलन, पुरारोगविज्ञान (पैलियोपैथोलॉजी) संबंधी गहन जांच और प्राचीन पर्यावरण के पुनर्निर्माण जैसी आधुनिक प्रणालियों को लागू किया जा रहा है। एएनएसआई के अनुसार, यह जटिल शोध कार्य लखनऊ स्थित बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोसाइंसेज (बीएसआईपी), यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (यूसीएल) और प्राचीन डीएनए अनुसंधान के क्षेत्र में वैश्विक विशेषज्ञता रखने वाले बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के शीर्ष वैज्ञानिकों और विद्वानों की एक संयुक्त टीम के सहयोग से संचालित किया जा रहा है। इन अत्याधुनिक परीक्षणों से हड़प्पा काल के मनुष्यों के वंशज, उनके प्रवास के पैटर्न, खान-पान की आदतें, उस दौर में फैलने वाली बीमारियां, पर्यावरण के प्रति उनकी अनुकूलन रणनीतियों और मानव-प्रकृति अंतःक्रियाओं के बारे में बेहद सटीक और प्रामाणिक वैज्ञानिक डेटा सामने आने की उम्मीद है।
यह परियोजना भारत के पुरामानवविज्ञान अनुसंधान के क्षेत्र में एक नए पुनरुत्थान का प्रतीक बनकर उभरी है। यद्यपि साल 1945 में अपनी स्थापना के समय से ही भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण ने सिंधु-सरस्वती स्थलों से प्राप्त अवशेषों पर अस्थिविज्ञान अनुसंधान की एक समृद्ध और लंबी परंपरा को संजोकर रखा था, लेकिन तकनीकी संसाधनों की कमी और विभिन्न प्रशासनिक चुनौतियों के चलते बीते वर्षों में इस क्षेत्र में शोध की गति काफी धीमी पड़ गई थी। हालांकि, हाल के वर्षों में संस्थान ने समर्पित अनुसंधान टीमों के गठन और अपने वैज्ञानिक कर्मियों के लिए वैश्विक स्तर के विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन कर इस विभाग को पूरी तरह पुनर्जीवित कर दिया है। एएनएसआई ने हाल ही में कई अन्य सिंधु-सरस्वती स्थलों के कंकाल अवशेषों पर अपना पुरारोग विज्ञान संबंधी अध्ययन सफलतापूर्वक पूरा भी कर लिया है, जिसके निष्कर्षों पर आधारित वैज्ञानिक शोध पत्र जल्द ही दुनिया के सामने प्रकाशित किए जाने वाले हैं। राखीगढ़ी के इन नए अवशेषों के मिलने से विशेषकर प्राचीन डीएनए विश्लेषण की राष्ट्रीय क्षमताओं को एक अभूतपूर्व मजबूती मिलेगी, जिसके लिए संस्थान अब भारतीय प्राणी सर्वेक्षण, भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण, भारतीय भूविज्ञान सर्वेक्षण और पुरातात्विक जलवायु पर काम कर रहे अन्य वैश्विक अनुसंधान समूहों के साथ एक साझा अंतर-संस्थागत नेटवर्क स्थापित करने की वृहद योजना पर काम कर रहा है।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
