परमहंस योगानन्द द्वारा 'आनंद से सराबोर' और स्वामी शिवानंद सरस्वती द्वारा 'भारतीय मिट्टी का सबसे पूर्ण पुष्प' कही जाने वाली आनंदमयी मां बीसवीं शताब्दी की एक ऐसी महान रहस्यवादी, संत और शिक्षिका थीं, जिन्हें उनके अनुयायी साक्षात देवी दुर्गा और काली का अवतार मानते थे। भक्ति योग से ओतप्रोत उनका संपूर्ण जीवन दैवीय कृपा का एक ऐसा जीवंत उदाहरण था, जिसने तत्कालीन सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश को सेवा, प्रेम और ईश्वर के निरंतर स्मरण के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया। उनके भक्तों ने उनके भीतर भविष्य-दर्शन, विश्वास से रोगमुक्ति और चमत्कार जैसी अनेक आध्यात्मिक शक्तियों का अनुभव किया। इस अलौकिक विभूति का जन्म ३० अप्रैल १८९६ को तत्कालीन बंगाल प्रेसीडेंसी के तिपेरा जिले (अब ब्राह्मणबारिया, बांग्लादेश) के खेओरा गाँव में एक रूढ़िवादी बंगाली हिंदू ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बिपिनबिहारी भट्टाचार्य और मोक्षदा सुंदरी देवी की संतान के रूप में जन्मीं इस कन्या का प्रारंभिक नाम निर्मला सुंदरी देवी रखा गया था। उनके पिता एक वैष्णव गायक थे जो अपनी गहन भक्ति के लिए जाने जाते थे, और यद्यपि उनका परिवार अत्यधिक गरीबी में जीवन यापन कर रहा था, परंतु दोनों ही माता-पिता सम्मानित वंश से ताल्लुक रखते थे। निर्मला सुंदरी का बचपन आम बच्चों जैसा नहीं था; उनकी माता के अनुसार उनके तीन भाइयों की बचपन में ही मृत्यु हो जाने के कारण स्कूल की लंबी दूरी तय करने के लिए उनके साथ कोई जाने वाला नहीं था, जिसके चलते वे सुल्तानपुर और खेओरा के ग्रामीण स्कूलों में केवल दो से चार महीने ही शिक्षा प्राप्त कर सकीं। अपनी कुशाग्र बुद्धि से शिक्षकों को प्रसन्न करने वाली निर्मला के इस हमेशा उदासीन लेकिन अत्यधिक प्रसन्न रहने वाले व्यवहार ने उनकी मां को चिंतित कर दिया था। यहाँ तक कि एक बार जब उनकी माता गंभीर रूप से बीमार पड़ीं, तब भी इस बालिका को पूरी तरह अप्रभावित और शांत देखकर रिश्तेदारों को घोर आश्चर्य हुआ था।

ग्रामीण प्रथाओं के अनुरूप, मात्र १२ वर्ष और १० महीने की आयु में निर्मला का विवाह बिक्रमपुर के रमणी मोहन चक्रवर्ती के साथ तय कर दिया गया, जिन्हें निर्मला ने बाद में 'भोलानाथ' नाम दिया। विवाह के पश्चात अगले पांच वर्षों तक वे अपने जेठ के घर में रहीं, जहाँ वे अधिकांश समय एक अंतर्मुखी और ध्यानमग्न अवस्था में रहते हुए घर का सारा काम-काज निपटाती थीं। अष्टग्राम में निवास के दौरान हरकुमार नामक एक धर्मपरायण पड़ोसी ने पहली बार उनकी आध्यात्मिक श्रेष्ठता को पहचाना और उन्हें 'मां' कहकर पुकारना शुरू किया तथा सुबह-शाम आदरपूर्वक उनके चरणों में प्रणाम करने लगे। जब निर्मला लगभग १७ वर्ष की हुईं, तब वे अष्टग्राम में अपने पति के साथ रहने चली गईं। उनका यह दांपत्य जीवन सामाजिक मानदंडों से बिल्कुल परे और पूर्णतः ब्रह्मचर्य पर आधारित था, क्योंकि जब कभी रमणी के मन में कामुक विचार आते थे, तो निर्मला का शरीर स्वतः ही निर्जीववत या मृत्यु के लक्षणों को धारण कर लेता था। अष्टग्राम में ही निर्मला ने पहली बार सार्वजनिक रूप से आध्यात्मिक भाव-समाधि के लक्षण प्रदर्शित किए, जिससे कई असाधारण और शारीरिक घटनाएं जुड़ी थीं। ग्रामीणों ने उनके माता-पिता को सूचित किया कि निर्मला 'हिस्टीरिया' से पीड़ित हो गई हैं, परंतु उनके पति भोलानाथ ने अपनी पत्नी का बचाव किया और ससुराल वालों को आश्वस्त किया कि निर्मला पूरी तरह स्वस्थ हैं। वर्ष १९१८ में यह दंपति बाजितपुर चला गया, जहाँ वे १९२४ तक रहे। इस कालखंड में कीर्तन सुनते समय निर्मला अक्सर गहरे आध्यात्मिक आनंद और भाव में डूब जाती थीं, जिससे उनके पति चिंतित रहने लगे क्योंकि वे अक्सर भूमि पर गिर जाती थीं और उन्हें सामान्य चेतना में लौटने में घंटों का समय लग जाता था।

उनके आध्यात्मिक जीवनीकारों के अनुसार, वर्ष १९१८ के अंत से निर्मला सुंदरी रात के समय पूरी तरह से हरिनाम में विलीन रहने लगीं, जो उनकी सांसों के आने-जाने के साथ स्वतः ही गूंजता रहता था। इस अवधि में उनके शरीर में बिना किसी मानवीय प्रयास के स्वतः ही जटिल योग मुद्राएं और आसन प्रकट होने लगे, जहाँ पैर खुद-ब-खुद पद्मासन का रूप ले लेते थे और भोर में सोकर उठने पर उनका पूरा शरीर सिर से पैर तक आनंद की लहरों से भर जाता था। ३ अगस्त १९२२ की पूर्णिमा की आधी रात को, २६ वर्ष की आयु में निर्मला ने स्वयं अपनी आध्यात्मिक दीक्षा की प्रक्रिया को संपन्न किया। उन्होंने बाद में स्पष्ट किया था कि यह पूरी वैदिक दीक्षा पद्धति, जिसमें फूलों की आहुति, यंत्र निर्माण और यज्ञ की अग्नि समाहित थी, उनके भीतर स्वतः ही प्रकट हो रही थी और उन्होंने स्वयं ही गुरु के रूप में मंत्र प्रकट किया तथा शिष्य के रूप में उसे ग्रहण किया। वर्ष १९२४ में वे अपने पति के साथ ढाका के शाहबाग चली गईं, जहाँ भोलानाथ को नवाब के बगीचों का कार्यवाहक नियुक्त किया गया था। शाहबाग में सार्वजनिक कीर्तनों के दौरान उनकी भाव-समाधि को देखकर लोग उनकी ओर खिंचे चले आए और ज्योतिशचंद्र राय, जिन्हें 'भाईजी' के नाम से जाना जाता है, उनके सबसे प्रारंभिक शिष्यों में से एक बने। भाईजी ने ही सबसे पहले निर्मला को 'आनंदमयी मां' नाम दिया था। उन्हीं के प्रयासों से वर्ष १९२९ में रमना काली मंदिर के परिसर में मां आनंदमयी के पहले आश्रम का निर्माण हुआ। इससे पूर्व १९२६ में उन्होंने सिद्धेश्वरी क्षेत्र में एक परित्यक्त प्राचीन काली मंदिर का जीर्णोद्धार भी किया था।

समय के साथ उनका प्रभाव बढ़ता गया और देहरादून स्थानांतरित होने के बाद, महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज (संस्कृत विद्वान और वाराणसी के सरकारी संस्कृत कॉलेज के प्राचार्य), प्राणगोपाल मुखर्जी और त्रिगुणा सेन जैसे महान विद्वान उनकी आध्यात्मिक आभा, प्रेम के संदेश और शक्तियों के प्रति आकर्षित हुए, जबकि मां खुद को हमेशा 'एक छोटी अनपढ़ बच्ची' ही कहती रहीं। सुप्रसिद्ध नृत्य कलाकार उदय शंकर भी नृत्य के प्रति उनके इस दृष्टिकोण से अत्यधिक प्रभावित हुए, जिसमें मां ने नृत्य को मनुष्य और ईश्वर के बीच के संबंध के रूप में परिभाषित किया था। १९५० के दशक से वाराणसी में 'श्री श्री मां आनंदमयी संघ' के आधिकारिक मुख्यालय की स्थापना के साथ उनके कार्यों का संस्थागतकरण शुरू हुआ, जिसके स्थापना दिवस पर पांच हजार से अधिक शिष्य एकत्र हुए थे। इस दौरान उन्होंने दक्षिण भारत की भी यात्रा की, जहाँ श्रीरंगम जैसे महान मंदिरों में उनका भव्य स्वागत हुआ और उनके दर्शन के लिए दस-दस हजार लोगों की भीड़ उमड़ी। वे अपने समय के महान संतों जैसे उड़िया बाबा, श्री अरविंद, रमण महर्षि, स्वामी रामदास, नीम करोली बाबा और परमहंस योगानन्द की समकालीन थीं। मां आनंदमयी कभी भी पहले से तैयार भाषण नहीं देती थीं और न ही अपनी कही बातों को लिखती थीं; उनकी बातचीत की तीव्र गति और बंगाली शब्दों के अनुप्रास के कारण उनके संवादों को लिखना बेहद कठिन होता था, जिसे उनकी निजी परिचारिका गुरुप्रिया देवी और भक्त ब्रह्मचारी कमल भट्टाचार्य ने लिपिबद्ध करने का अथक प्रयास किया।

मां आनंदमयी की शिक्षाओं का मुख्य केंद्र बिंदु यह था कि प्रत्येक मनुष्य का सर्वोच्च कर्तव्य आत्म-साक्षात्कार के लिए प्रयास करना है और अन्य सभी दायित्व इसके बाद आते हैं। वे मानती थीं कि केवल वही कर्म वास्तव में कर्म कहलाने योग्य हैं जो मनुष्य की दैवीय प्रकृति को जाग्रत करते हैं। हालांकि, उन्होंने कभी भी सभी को संन्यासी बनने की सलाह नहीं दी और यह कहकर आध्यात्मिक विवादों को शांत कर दिया कि हर व्यक्ति अपने दृष्टिकोण से सही है। उन्होंने कभी औपचारिक दीक्षा नहीं दी और न ही खुद को गुरु कहलाना पसंद किया, क्योंकि उनका मानना था कि सभी मार्ग उन्हीं के मार्ग हैं। उन्होंने सभी के लिए एक समान आध्यात्मिक पद्धति की वकालत नहीं की, बल्कि इस बात पर जोर दिया कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी जन्मजात प्रकृति के अनुसार आगे बढ़ सकता है। यही कारण था कि उनके द्वार शैव, वैष्णव, तांत्रिक, इस्लाम, ईसाई, यहूदी, सिख, बौद्ध और पारसी सहित सभी धर्मों के लोगों के लिए हमेशा खुले थे। वे खुद के लिए हमेशा 'यह शरीर' या 'यह छोटी लड़की' जैसे शब्दों का उपयोग करती थीं, जो अहंकार से पूरी तरह मुक्त होने की हिंदू आध्यात्मिक परंपरा का हिस्सा था। उनके इस निश्छल और अलौकिक व्यक्तित्व का प्रभाव ऐसा था कि खेओरा की स्थानीय मुस्लिम आबादी आज भी उन्हें 'हमारी अपनी मां' कहकर याद करती है। परमहंस योगानन्द ने अपनी पुस्तक 'ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी' में उनके साथ हुई अपनी मुलाकात का जीवंत वर्णन किया है, जिसमें मां ने अपनी शाश्वत चेतना को स्पष्ट करते हुए कहा था कि संसार के इस शाश्वत रंगमंच पर सृष्टि का नृत्य चाहे जितना बदल जाए, उनकी चेतना हमेशा एक समान, अपरिवर्तित और स्थिर रही है। २७ अगस्त १९८२ को देहरादून में इस महान चेतना ने अपने नश्वर शरीर का त्याग कर दिया, जिसके बाद २९ अगस्त १९८२ को उत्तर भारत के हरिद्वार में गंगा नदी के तट पर स्थित उनके कनखल आश्रम के प्रांगण में उनकी समाधि बनाई गई।

मां आनंदमयी का भौतिक रूप से चले जाना उनके प्रभाव का अंत नहीं था, बल्कि उनकी विरासत आज भी मानवता को आलोकित कर रही है। वाराणसी का श्री श्री आनंदमयी संघ आज भी 'अमृत वार्ता' नामक त्रैमासिक पत्रिका के माध्यम से अंग्रेजी, हिंदी, गुजराती और बंगाली में उनकी अनमोल शिक्षाओं का प्रसार कर रहा है, जबकि हरिद्वार का संघ प्रतिवर्ष 'संयम महाव्रत' का आयोजन करता है जहाँ हजारों लोग सामूहिक ध्यान और भक्ति संगीत में डूब जाते हैं। उनकी शिक्षाएं आज के आधुनिक समाज को याद दिलाती हैं कि सांसारिक कर्तव्य निभाते हुए भी ईश्वर से जीवंत संपर्क बनाए रखा जा सकता है, जिससे जीवन के सूखे पत्ते स्वतः ही गिर जाते हैं और नए दिव्य विचारों का प्रस्फुटन होता है। उनका यह कथन कि 'सांसारिक पेंशन तो जीवन के साथ समाप्त हो जाती है, परंतु दैवीय पेंशन मृत्यु के बाद भी जारी रहती है', मानव जाति को भौतिकता से ऊपर उठकर शाश्वत सत्य को खोजने की निरंतर प्रेरणा देता रहेगा।

Pratahkal HQ

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