कौन थे अमर सिंह राठौर? मरुधरा के वो अजेय योद्धा जिन्होंने मुगल दरबार में अपने स्वाभिमान के लिए दी थी प्राणों की आहुति।
मुगल दरबार में स्वाभिमान के लिए सलाबत खान का वध करने वाले राव अमर सिंह राठौर के जीवन और उनके ऐतिहासिक बलिदान का विवरण।

अठारहवीं शताब्दी के भारतीय इतिहास में नागौर के शासक राव अमर सिंह राठौर का नाम एक ऐसे प्रतापी योद्धा के रूप में दर्ज है, जिनकी तलवार की खनक ने मुगल सल्तनत की नींव हिला दी थी। मारवाड़ के महाराजा गज सिंह के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में 11 दिसंबर 1613 को जन्मे अमर सिंह राठौर शौर्य और स्वाभिमान की प्रतिमूर्ति थे। यद्यपि वे मारवाड़ के उत्तराधिकारी थे, परंतु पारिवारिक परिस्थितियों और पिता द्वारा निर्वासन के पश्चात उन्होंने मुगल सम्राट शाहजहाँ की सेवा स्वीकार की। उनकी वीरता और युद्ध कौशल से प्रभावित होकर सम्राट ने उन्हें शाही सम्मान दिया और नागौर की सूबेदारी सौंपकर राजा की उपाधि से विभूषित किया। अमर सिंह के शासन का आधार उनका अदम्य साहस था, जिसने उन्हें मुगलों के दरबार में एक विशिष्ट पहचान दिलाई, लेकिन यही विशिष्टता उनके शत्रुओं की ईर्ष्या का कारण भी बनी।
अमर सिंह राठौर की जीवन यात्रा का सबसे निर्णायक मोड़ तब आया जब उनकी अनुपस्थिति को आधार बनाकर मुगल दरबार के बख्शी सलाबत खान ने उन पर जुर्माना लगाने का षड्यंत्र रचा। सलाबत खान, जो अमर सिंह की बढ़ती प्रतिष्ठा से द्वेष रखता था, ने सम्राट को भड़काकर उनके खिलाफ आदेश पारित करवा दिए। जब अमर सिंह दरबार में उपस्थित हुए, तो सलाबत खान ने भरी सभा में उन्हें अपमानित करने का दुस्साहस किया और उन्हें 'गंवार' कहकर संबोधित किया। अपने आत्मसम्मान पर लगे इस आघात को अमर सिंह सहन न कर सके और बिजली की गति से अपनी कटार निकाल कर एक ही वार में सलाबत खान का गला काट दिया। यह घटना इतनी आकस्मिक और साहसी थी कि स्वयं सम्राट शाहजहाँ भी हतप्रभ रह गए। अपनी जान बचाने के लिए सम्राट को वहां से भागना पड़ा, जबकि अमर सिंह ने अकेले ही उन पर हमला करने वाले मुगल सैनिकों का संहार किया और अपने घोड़े पर सवार होकर आगरा किले की विशाल प्राचीर से छलांग लगा दी।
अमर सिंह की इस वीरता ने मुगल दरबार में खौफ पैदा कर दिया था, जिसे षड्यंत्र के बिना जीतना असंभव था। सम्राट ने घोषणा की कि जो भी अमर सिंह का वध करेगा, उसे जागीर दी जाएगी। अंततः अमर सिंह के सगे साले अर्जुन सिंह ने लालच में आकर विश्वासघात की योजना बनाई। धोखे से अमर सिंह को यह विश्वास दिलाया गया कि सम्राट ने उन्हें क्षमा कर दिया है। आगरा किले के एक संकरे द्वार से गुजरते समय, जब अमर सिंह ने झुकने से इनकार किया, तब अर्जुन सिंह ने पीछे से उनके सीने में कटार घोंपकर उनकी हत्या कर दी। अमर सिंह के बलिदान की सूचना मिलते ही उनकी पत्नी और बल्लू जी चांपावत जैसे वीर राजपूत योद्धाओं ने मुगल सेना पर भीषण आक्रमण कर दिया। अपने स्वामी के पार्थिव शरीर को सम्मानपूर्वक वापस लाने के लिए उन वीरों ने अंतिम सांस तक युद्ध किया और वीरगति प्राप्त की।
आज भी आगरा किले का 'अमर सिंह द्वार' उस महान योद्धा की स्मृति को अक्षुण्ण बनाए हुए है, जिसकी वीरता के आगे मुगलों को भी झुकना पड़ा था। नागौर में उनकी 16 स्तंभों वाली छतरी उनकी महानता की गवाह है। लोकगीतों और 'कटार के धनी' जैसी उपाधियों के माध्यम से अमर सिंह राठौर आज भी राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पंजाब की लोक संस्कृति में जीवित हैं। उनका जीवन हमें यह सीख देता है कि सत्ता और पद से कहीं ऊपर व्यक्ति का स्वाभिमान होता है, जिसकी रक्षा के लिए प्राणों का उत्सर्ग करना ही एक सच्चे क्षत्रिय का धर्म है। भारतीय इतिहास के पन्नों में अमर सिंह राठौर का नाम हमेशा एक ऐसे नायक के रूप में अमर रहेगा, जिसने कभी झुकना नहीं सीखा।

