राजस्थान की रेतीली धोरों से निकलकर अपनी जादुई गायकी के जरिए पूरी दुनिया में मारवाड़ की खुशबू फैलाने वाली अल्लाह जिलाई बाई का व्यक्तित्व भारतीय शास्त्रीय और लोक संगीत के आकाश में एक दैदीप्यमान नक्षत्र की भांति है। 1 फरवरी 1902 को बीकानेर के जे.डी. मगरा गांव में जन्मी इस महान कलाकार ने लोक संगीत की 'मांड' शैली को जो गरिमा और पहचान दिलाई, वह आज भी संगीत प्रेमियों के लिए एक अनमोल धरोहर है। उनका संगीत सफर तब शुरू हुआ जब उनकी नैसर्गिक प्रतिभा को बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह के दरबार में पहचान मिली। उस्ताद हुसैन बख्श लंगड़े के सानिध्य में उनकी गायकी को वह धार और परिपक्वता मिली, जिसने उन्हें महज तेरह वर्ष की अल्पायु में ही 'राजगायिका' की प्रतिष्ठित पदवी तक पहुँचा दिया। दरबार की चकाचौंध के बीच अल्लाह जिलाई बाई ने न केवल मांड गायकी में महारत हासिल की, बल्कि वे ठुमरी, ख्याल और दादरा जैसे शास्त्रीय स्वरूपों में भी उतनी ही निपुण सिद्ध हुईं। उनके कंठ से निकले सुरों ने 'केसरिया बालम पधारो म्हारे देस' जैसे गीतों को एक ऐसा अमर स्वरूप दिया कि आज यह गीत राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान का पर्याय बन चुका है। इसके साथ ही 'बाई सा रा बीरा', 'काली काली काजलिये री रेख' और 'झालो दियो जाये' जैसे गीतों ने उनकी गायकी की विविधता और गहराई को जगजाहिर किया। उनकी कला के प्रति समर्पण और सांस्कृतिक योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1982 में 'पद्म श्री' से सम्मानित किया, जो उनकी कलात्मक यात्रा का एक स्वर्णिम पड़ाव था। उनके देहावसान के उपरांत उनकी विरासत को अक्षुण्ण रखते हुए सरकार द्वारा उन्हें 'राजस्थान रत्न' पुरस्कार देने की घोषणा की गई, जो उनके ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करता है। अल्लाह जिलाई बाई ने अपनी गायकी के माध्यम से न केवल राजस्थान की परंपराओं को जीवित रखा, बल्कि उसे वैश्विक मंच पर एक गौरवपूर्ण स्थान भी दिलाया। आज भी जब कभी रेगिस्तान की हवाओं में मांड के सुर गूंजते हैं, तो उनकी रूहानी आवाज़ का अहसास हर श्रोता को एक दिव्य अनुभव से भर देता है, जो उन्हें संगीत के इतिहास में सदैव जीवित रखेगा।

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