कौन हैं आदिवासी? भारतीय संस्कृति के मूल प्रतीक और सभ्यता के आदि-शिल्पी
सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ाव, जल-जंगल-जमीन का संघर्ष और भारतीय समाज व संस्कृति के विकास में जनजातीय समुदायों के ऐतिहासिक योगदान का पूरा विवरण।

कौन हैं आदिवासी? भारतीय संस्कृति के मूल प्रतीक और सभ्यता के आदि-शिल्पी
भारत की सनातन भूमि पर जब सभ्यताओं के विकास का इतिहास लिखा जा रहा था, तब इस उपमहाद्वीप के सघन वनों, दुर्गम पर्वतों और प्राकृतिक अंचलों में एक ऐसी विशिष्ट संस्कृति पुष्पित-पल्लवित हो रही थी जिसे आज हम 'आदिवাসী' के नाम से जानते हैं। बीसवीं शताब्दी में जन-चेतना और राजनीतिक सक्रियता के साथ उभरा यह शब्द 'आदि' (शुरुआत) और 'वासी' (निवासी) के योग से बना है, जिसका सीधा और प्रामाणिक अर्थ इस भूमि के मूल और प्राचीनतम निवासियों से है। समकालीन दौर में जहां भारतीय संविधान के तहत इन्हें 'अनुसूचित जनजाति' के रूप में कानूनी और प्रशासनिक मान्यता प्राप्त है, वहीं बांग्लादेश में इन्हें 'नृजातीय अल्पसंख्यक' कहा जाता है। वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, भारत की कुल आबादी में इनकी हिस्सेदारी लगभग 8.6 प्रतिशत यानी 10.4 करोड़ से अधिक है, जो देश के सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने की विविधता को प्रदर्शित करती है। भारत के सार्वजनिक विमर्श और इतिहास-लेखन में आदिवासियों का अस्तित्व केवल एक जनसांख्यिकी आंकड़ा नहीं, बल्कि एक जीवंत, अटूट और संप्रभु सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में आदिवासियों की उत्पत्ति और उनका उद्भव सिंधु घाटी सभ्यता के चरमोत्कर्ष और उसके परवर्ती कालखंड से जुड़ा हुआ है। पुरातत्व और नृवंशविज्ञान के शोध स्पष्ट करते हैं कि आज के आदिवासी समुदाय द्रविड़, भारत-आर्य, ऑस्ट्रो-एशियाई और तिब्बती-बर्मी भाषाई परिवारों के प्राचीनतम पूर्वजों के आनुवंशिक सम्मिश्रण से निर्मित हुए हैं। अंडमान द्वीप समूह के जारवा और सेंटिनलीज़ जैसे समुदायों का इतिहास तो 25,000 वर्षों से भी अधिक समय की सुरक्षात्मक पृथकता को दर्शाता है। भाषाई और सांस्कृतिक रूप से भारत के इन सात सौ से अधिक जनजातीय समूहों को मुख्य रूप से अंडमानी, ऑस्ट्रो-एशियाई, द्रविड़, इंडो-आरियन और सिनो-तिब्बती जैसे पांच प्रमुख भाषा परिवारों में वर्गीकृत किया गया है। भौगोलिक दृष्टि से इनका विस्तार उत्तर-पश्चिम हिमालय के अर्ध-घुमंतू समूहों से लेकर पूर्वोत्तर के अरुणाचल, नागालैंड, मिजोरम और मेघालय जैसे राज्यों तक फैला है, जहां की नब्बे प्रतिशत से अधिक आबादी जनजातीय है। इसके अतिरिक्त, गुजरात और राजस्थान से लेकर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और पश्चिम बंगाल तक फैली 'जनजातीय पट्टी' (ट्राइबल बेल्ट) में देश की लगभग 75 प्रतिशत आदिवासी आबादी निवास करती है, जिसमें भील, गोंड, संथाल, मुंडा और मीणा जैसे वृहत समुदाय शामिल हैं।
प्राचीन और मध्यकालीन भारतीय समाज में आदिवासियों की स्थिति जाति व्यवस्था के जटिल बंधनों से पूर्णतः मुक्त और स्वायत्त थी। ऐतिहासिक रूप से इन्हें कभी भी समाज के अन्य वंचित वर्गों की तरह जन्मजात अशुद्ध या अस्पृश्य नहीं माना गया, बल्कि समकालीन शासकों के साथ इनके संबंध परस्पर सम्मान और रणनीतिक साझेदारी के थे। भारतीय वास्तुकला, राजशाही और सत्ता के समीकरणों में मध्य भारत के गोंड राजाओं (जैसे गढ़-मंडला और चंदा के राजवंश), भील सरदारों और मीणा शासकों का गौरवशाली इतिहास रहा है, जिन्होंने गैर-जनजातीय प्रजा पर भी एक सामंत के रूप में शासन किया। इसी तरह, आधुनिक हिंदू धर्म के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विकास में आदिवासी दर्शन का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि, प्रभु श्री राम को कंद-मूल भेंट करने वाली भील समुदाय की माता शबरी, और महाभारत काल के अद्वितीय धनुर्धर एकलव्य जैसे ऐतिहासिक व पौराणिक पात्र आदिवासियों की उच्च आध्यात्मिक और सामाजिक प्रतिष्ठा के अकाट्य प्रमाण हैं। यही नहीं, जगन्नाथ संस्कृति और भुवनेश्वर के लिंगराज मंदिर में आज भी ब्राह्मणों के साथ 'बाडु' नामक जनजातीय पुजारियों की मुख्य भूमिका इस अंतर्संबंध को पुष्ट करती है।
आदिवासियों का धार्मिक और आध्यात्मिक जीवन पूर्णतः प्रकृति की उपासना और उसके साथ एकात्मता पर आधारित है, जिसे 'एनीमिज्म' या जीववाद कहा जाता है। इसके तहत पेड़-पौधे, पशु, पर्वत और नदियों को आध्यात्मिक चेतना से युक्त मानकर पूजा जाता है। छोटानागपुर पठार के मुंडा, हो, उरांव और संथाल समुदायों का 'सरना धर्म' (पवित्र उपवनों की संस्कृति) और अरुणाचल प्रदेश की तानी जनजातियों का 'दोन्यी-पोलो' (सूर्य-चंद्रमा उपासना) इसके उत्कृष्ट उदाहरण हैं। हालांकि, औपनिवेशिक कालखंड से शुरू हुए मतांतरण के चक्र के कारण एक बड़े हिस्से ने ईसाई धर्म, इस्लाम और हिंदू धर्म की सनातनी परंपराओं को भी अपनाया है। आदिवासियों के इस प्राकृतिक दर्शन की झलक उनके समृद्ध साहित्य में भी मिलती है, जो पूर्व में मुख्य रूप से मौखिक परंपरा (लोकोक्तियां, लोकगीत) के रूप में जीवित था और अब हंसदा सोवेंद्र शेखर, निर्मला पुतुल और रामदयाल मुंडा जैसे लेखकों के माध्यम से लिखित रूप में वैश्विक मंच पर अपनी छाप छोड़ रहा है। बंदर, गाय, नाग, पीपल और तुलसी जैसी प्राकृतिक प्रकृतियों को आधुनिक समाज में जो पवित्र स्थान प्राप्त है, उसकी जड़ें भी आदिवासियों के इसी टोटमवादी (प्रतीकवादी) सांस्कृतिक इतिहास में समाहित हैं।
सोलहवीं शताब्दी में मुगलों के आगमन और तत्पश्चात ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की स्थापना ने आदिवासियों की पारंपरिक स्वायत्तता और उनकी 'जल, जंगल, जमीन' की साझा विरासत पर गहरा आघात किया। अंग्रेजों द्वारा थोपी गई स्थायी बंदोबस्त, जमींदारी और जागीरदारी व्यवस्थाओं ने आदिवासियों को उनकी अपनी ही भूमि पर बंधुआ मजदूर बनने के लिए विवश कर दिया। इस घोर आर्थिक शोषण, वनों के दोहन और सांस्कृतिक हस्तक्षेप के विरुद्ध आदिवासियों ने इतिहास के कुछ सबसे उग्र और प्रभावी विद्रोहों का नेतृत्व किया। सन् 1774 के हलबा विद्रोह से लेकर, चुआड़, भील, हो-मुंडा, कोल, भूमिज और सन् 1855-56 के ऐतिहासिक 'संथाल हुल' (संथाल विद्रोह) ने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी। अंततः उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हुए 'उलगुलान' (महान विद्रोह) ने आदिवासियों की अस्मिता को नई दिशा दी। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में धरणीधर भूइयां, लक्ष्मण नायक, जंत्या भील और मंगरी ओरांव जैसे अनगिनत आदिवासी नायकों ने अपने प्राणों की आहुति दी। स्वतंत्रता के बाद जब संविधान सभा में जयपाल सिंह मुंडा ने आदिवासियों के अधिकारों की वकालत की, तब कानूनी सुस्पष्टता के लिए डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने 'अनुसूचित जनजाति' शब्द को अंगीकार किया, जो आज भी भारतीय राज्यव्यवस्था में उनके अधिकारों का सुरक्षा कवच बना हुआ है।

