भारत में मातृ मृत्यु दर में भारी गिरावट; सुरक्षित जननी से ही बढ़ेगा भारत का गौरव
राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस पर विशेष रिपोर्ट: जानें कैसे सरकारी योजनाओं और सामाजिक जागरूकता से बदल रही है भारतीय जननी की तस्वीर। सुरक्षित मां ही है सशक्त राष्ट्र का आधार।

National Safe Motherhood Day India : भारतीय संस्कृति में नारी को सृजन की मूलाधार शक्ति और समूची सभ्यता की संवाहक माना गया है। शास्त्रों में "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" का उद्घोष कर मां को स्वर्ग से भी श्रेष्ठ स्थान दिया गया है, लेकिन आधुनिक समाज के सामने सबसे बड़ी विडंबना यह रही है कि जिस 'शक्ति' को पूजा गया, उसी के मातृत्व को लंबे समय तक उपेक्षा और असुरक्षा के साये में रहना पड़ा। प्रसव के दौरान चिकित्सा सुविधाओं का अभाव और कुपोषण की मार ने सदियों तक मां के अस्तित्व को संकट में डाला है। इसी ऐतिहासिक विरोधाभास को समाप्त करने और हर महिला के सुरक्षित मातृत्व के अधिकार को सुनिश्चित करने के संकल्प के साथ भारत में प्रतिवर्ष 11 अप्रैल को 'राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस' मनाया जाता है। यह दिवस केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की उस आधारशिला को मजबूत करने का वादा है, जिस पर देश का भविष्य अंकुरित होता है।
भारत में मातृ स्वास्थ्य की यात्रा परंपरा के गौरव से लेकर आधुनिक प्रगति के तालमेल तक फैली हुई है। वैदिक काल में "मातृ देवो भव" के मंत्र के साथ मां को प्रथम गुरु का दर्जा दिया गया, वहीं समकालीन भारत में इस सांस्कृतिक चेतना को स्वास्थ्य के अधिकार से जोड़ते हुए वर्ष 2003 में 11 अप्रैल को आधिकारिक तौर पर यह विशेष दिवस घोषित किया गया। आज मातृत्व को केवल एक जैविक प्रक्रिया या व्यक्तिगत कर्तव्य के रूप में नहीं, बल्कि एक साझा सामाजिक और राष्ट्रीय जिम्मेदारी के रूप में देखा जा रहा है। पिछले कुछ दशकों में भारत ने मातृ मृत्यु दर (MMR) में ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की है, जो इस दिशा में किए गए निरंतर प्रयासों का प्रमाण है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार और संस्थागत प्रसव में हुई अभूतपूर्व वृद्धि ने लाखों महिलाओं के जीवन को सुरक्षा कवच प्रदान किया है।
इस परिवर्तनकारी यात्रा में भारत सरकार की दूरदर्शी योजनाओं ने एक सुदृढ़ नींव का कार्य किया है। जननी सुरक्षा योजना (JSY) ने आर्थिक प्रोत्साहन के माध्यम से महिलाओं को अस्पतालों तक पहुँचाया, तो वहीं प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (PMSMA) के तहत हर माह की 9 तारीख को गर्भवती महिलाओं की निःशुल्क स्वास्थ्य जांच ने संभावित जोखिमों को समय रहते कम किया है। 'सुमन' (SUMAN) और 'लक्ष्य' (LaQshya) जैसे कार्यक्रमों ने न केवल स्वास्थ्य सेवाओं की सुलभता बढ़ाई है, बल्कि प्रसव कक्षों में गुणवत्ता और सम्मानजनक उपचार के नए मानक स्थापित किए हैं। सरकार का यह समग्र दृष्टिकोण पोषण और सुरक्षा को एक ही धुरी पर लाकर खड़ा करता है, जिससे "स्वस्थ मां, स्वस्थ शिशु" का वैज्ञानिक सत्य धरातल पर उतर रहा है।
हालांकि, इन सफलताओं के बावजूद चुनौतियां अब भी पूर्णतः समाप्त नहीं हुई हैं। ग्रामीण अंचलों में प्रशिक्षित चिकित्सा कर्मियों की कमी, परिवहन की बाधाएं और एनीमिया जैसी पोषण संबंधी समस्याएं आज भी एक गंभीर अवरोध बनी हुई हैं। डिजिटल इंडिया के इस युग में टेलीमेडिसिन और मोबाइल हेल्थ एप्स इन दूरियों को पाटने का नया जरिया बन रहे हैं, जो भविष्य के लिए एक आशावादी संकेत है। अंततः, मातृत्व की सुरक्षा केवल अस्पतालों की दीवारों तक सीमित नहीं है; यह समाज की सोच, महिलाओं की शिक्षा और उनके आर्थिक सशक्तिकरण से गहरे तक जुड़ी हुई है। सुरक्षित मातृत्व का यह राष्ट्रीय संकल्प हमें स्मरण कराता है कि जब जननी मुस्कुराएगी, तभी राष्ट्र प्रगति के पथ पर अडिग होकर अग्रसर होगा। मातृ स्वास्थ्य की रक्षा वास्तव में हमारी सभ्यता और संस्कृति की रक्षा है।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
