क्या पश्चिम बंगाल के गांव गंगनौली, बागपत में कृष्णा नदी का पानी बन रहा है ‘जहर’? बढ़ते कैंसर मामलों ने खड़े किए गंभीर सवाल
पश्चिम बंगाल से सटे गांव गंगनौली, बागपत में कृष्णा नदी का पानी काला और दूषित होने का दावा किया जा रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि इसी जहरीले पानी से कैंसर जैसी बीमारियां बढ़ रही हैं। प्रशासनिक जांच और स्वास्थ्य सर्वे की मांग तेज हो गई है।

पश्चिम बंगाल से सटे क्षेत्र में स्थित गांव गंगनौली, बागपत में इन दिनों एक गंभीर स्वास्थ्य संकट को लेकर चिंता गहराती जा रही है। स्थानीय लोगों का दावा है कि कृष्णा नदी का पानी धीरे-धीरे काला होता जा रहा है, और इसी दूषित जल के कारण गांव में कैंसर जैसी घातक बीमारियों के मामले बढ़ रहे हैं। ग्रामीणों के अनुसार, यह समस्या कोई नई नहीं है, लेकिन अब इसके प्रभाव इतने गहरे हो चुके हैं कि इसे नजरअंदाज करना संभव नहीं रहा।
ग्रामीणों का कहना है कि पहले कृष्णा नदी का पानी साफ और पीने योग्य हुआ करता था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसका रंग बदलकर गहरा और बदबूदार हो गया है। पानी में झाग, रासायनिक गंध और तैलीय परतें दिखाई देने लगी हैं। इसी पानी का उपयोग गांव के लोग पीने, नहाने और खेती के लिए करते हैं। उनका आरोप है कि इसी प्रदूषित पानी के लगातार संपर्क में रहने से कई लोगों में गंभीर बीमारियां, खासकर कैंसर, सामने आ रही हैं।
स्थानीय परिवारों ने बताया कि गांव में पिछले कुछ वर्षों में कई लोगों को मुंह, गले, त्वचा और पेट से जुड़े कैंसर का पता चला है। इनमें से कई मरीजों की मौत भी हो चुकी है। ग्रामीणों का कहना है कि पहले ऐसी बीमारियां यहां बहुत कम देखने को मिलती थीं, लेकिन अब यह आम होती जा रही हैं। इससे पूरे गांव में डर और अनिश्चितता का माहौल है।
इस पूरे मामले में ग्रामीणों का आरोप है कि नदी में आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाला रासायनिक कचरा, सीवेज और अन्य अपशिष्ट बिना किसी शुद्धिकरण के छोड़ा जा रहा है। इससे पानी की गुणवत्ता लगातार गिरती जा रही है। उनका कहना है कि नदी का रंग बदलना केवल एक संकेत है, असली खतरा इसमें घुले जहरीले तत्व हैं, जो शरीर में धीरे-धीरे जहर की तरह काम कर रहे हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक दूषित पानी का सेवन करने से शरीर में भारी धातुएं, रसायन और विषैले तत्व जमा हो सकते हैं, जो कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकते हैं। हालांकि, इस मामले में अभी तक कोई आधिकारिक मेडिकल रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन ग्रामीणों की शिकायतों ने प्रशासन का ध्यान खींचा है।
गांव के लोगों का कहना है कि उन्होंने कई बार स्थानीय प्रशासन और जल विभाग से शिकायत की, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। न तो पानी की गुणवत्ता की नियमित जांच की जा रही है और न ही किसी वैकल्पिक स्वच्छ जल व्यवस्था की व्यवस्था की गई है। मजबूरी में लोग वही दूषित पानी इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसे वे अपनी बीमारी की वजह मानते हैं।
प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, मामले की गंभीरता को देखते हुए जल नमूनों की जांच कराने और स्वास्थ्य सर्वे शुरू करने पर विचार किया जा रहा है। यदि यह साबित होता है कि नदी का पानी वास्तव में जहरीला है और इससे लोगों की सेहत पर असर पड़ रहा है, तो दोषी इकाइयों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। पर्यावरण संरक्षण कानूनों के तहत ऐसे मामलों में भारी जुर्माने और उद्योगों को बंद करने तक का प्रावधान है।
इस बीच, पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह मामला केवल एक गांव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देशभर में नदियों के बढ़ते प्रदूषण की भयावह तस्वीर को दिखाता है। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो ऐसे संकट और गहराते जाएंगे।
गंगनौली, बागपत के लोग अब सिर्फ जवाब नहीं, बल्कि समाधान चाहते हैं। उनका कहना है कि उन्हें स्वच्छ पानी चाहिए, नियमित स्वास्थ्य जांच चाहिए और यह भरोसा चाहिए कि उनकी आने वाली पीढ़ियां इस ‘जहरीले पानी’ के साथ जीने को मजबूर नहीं होंगी।
यह मामला केवल प्रदूषण का नहीं, बल्कि लोगों के जीवन और स्वास्थ्य का सवाल है। अब सभी की निगाहें प्रशासन की जांच और उसके बाद उठाए जाने वाले कदमों पर टिकी हैं, जो यह तय करेंगे कि कृष्णा नदी फिर से जीवनदायिनी बनेगी या यह संकट और गहराएगा।

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