Health Tips : आज की भागदौड़ भरी दुनिया में स्वास्थ्य को अक्सर पीछे छोड़ दिया जाता है, जबकि यह सच है कि स्वस्थ शरीर ही जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है। बदलती दिनचर्या, तैयार खाद्य पदार्थों की आदत और व्यायाम की कमी ने शरीर के उन महत्वपूर्ण अवयवों पर दबाव बढ़ा दिया है जो हमारी हर गतिविधि को संतुलित रखते हैं। इन्हीं में से एक है यकृत—शरीर का वह मौन प्रहरी जो लगभग पाँच सौ से अधिक जैविक प्रक्रियाओं को नियंत्रित करता है। आधुनिक जीवनशैली के प्रभाव में यह महत्वपूर्ण अवयव गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है।

यकृत पाचन से लेकर ऊर्जा उत्पादन तक और शरीर की विषहरण क्रिया से लेकर रक्त को स्वच्छ बनाए रखने तक अनगिनत कार्य संभालता है। रक्‍त में मौजूद टॉक्सिन हटाने का ज़िम्मा भी इसी पर होता है। स्वाभाविक है कि इसकी कार्यप्रणाली में जरा-सी भी बाधा पूरे शरीर को प्रभावित कर सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार हाल के वर्षों में यकृत विकारों में तेज़ी से वृद्धि देखी गई है, जिसका मुख्य कारण असंगत आहार, अनियमित दिनचर्या और लक्षणों की अनदेखी है।

सबसे गंभीर चुनौतियों में हेपेटाइटिस प्रमुख है—एक विषाणुजनित रोग जो यकृत में सूजन पैदा करता है। हेपेटाइटिस ए और ई दूषित पानी और भोजन से फैलते हैं, जबकि बी, सी और डी संक्रमित रक्त या शारीरिक द्रवों के संपर्क से। समय पर उपचार न मिले तो यह संक्रमण लिव्हर सिरोसिस या कैंसर तक पहुँचा सकता है। हेपेटाइटिस ए और बी के लिए उपलब्ध टीके सुरक्षा प्रदान करते हैं, जबकि सी और ई के लिए अभी कोई वैक्सीन नहीं है। भीड़भाड़ वाले इलाकों और साफ-सफाई की कमी वाले स्थानों में संक्रमण फैलने का ख़तरा अधिक रहता है।

लिव्हर सिरोसिस एक और गंभीर अवस्था है जिसमें यकृत स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो जाता है। अतिमद्यपान, चरबीयुक्त भोजन, अनियंत्रित कोलेस्ट्रॉल और कुछ दवाइयों के दुष्प्रभाव इसके कारण माने जाते हैं। जब क्षति बढ़ जाती है तो यकृत कठोर और सिकुड़ जाता है, जिसके बाद उपचार सीमित रह जाता है और कई मामलों में प्रत्यारोपण ही अंतिम विकल्प बचता है।

यकृत का कैंसर भी बढ़ती चिंताओं में शामिल है। यह या तो यकृत की कोशिकाओं में उत्पन्न होता है या शरीर के किसी अन्य हिस्से से फैलकर यकृत तक पहुँचता है। सिरोसिस, फॅटी लिवर और बार-बार होने वाली कावीळ जैसी स्थितियाँ इस जोखिम को बढ़ा देती हैं। गंभीर मामलों में रेडिएशन, कीमोथेरेपी, सर्जरी या लिव्हर ट्रान्सप्लांट की आवश्यकता पड़ सकती है।

कावीळ, जो आमतौर पर दूषित पानी से होने वाला विकार है, शरीर में बिलिरुबिन का स्तर बढ़ने से होता है। यदि यकृत इसका नियमन नहीं कर पाता तो डोळे पिवळे पडणे, गाढी लघवी, थकान और भूख न लगना जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। समय पर इलाज और आहार में सुधार से यह जल्द ठीक हो सकता है, परंतु लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यकृत को स्वस्थ रखने के लिए स्वच्छ पानी का सेवन, संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, मद्यपान से परहेज़ और समय-समय पर स्वास्थ्य जांच अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। बदलती जीवनशैली के इस दौर में यकृत की सुरक्षा केवल एक चिकित्सीय आवश्यकता नहीं, बल्कि जीवन के दीर्घकालिक संतुलन की भी अनिवार्यता बन गई है।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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