सोशल मीडिया पर बिताए 30 मिनट भी बच्चों के लिए होते है हानिकारक; नए स्टडीने किया खुलासा
यह लेख एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन पर आधारित है, जिसमें सोशल मीडिया के बढ़ते उपयोग और बच्चों की ध्यान केंद्रित करने की क्षमता में गिरावट के बीच सीधा संबंध पाया गया है। 9 से 14 वर्ष के बच्चों पर चार वर्षों तक किए गए शोध में खुलासा हुआ कि प्रतिदिन 30 मिनट से अधिक सोशल मीडिया उपयोग से उनकी एकाग्रता कमजोर होती जाती है।

30 minute social media effect kids
30 minute social media effect kids : एक हालिया अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने सोशल मीडिया के बढ़ते उपयोग और बच्चों में तेजी से कमजोर होते ध्यान के बीच सीधा संबंध उजागर किया है। शोध में पाया गया कि जो बच्चे प्रतिदिन 30 मिनट से अधिक समय Instagram, Snapchat, TikTok और Facebook जैसे प्लेटफॉर्म पर बिताते हैं, उनकी एकाग्रता की क्षमता लगातार गिरने लगती है। यह निष्कर्ष उस समय और गंभीर हो जाता है जब यह समझ आता है कि कई बच्चे उन प्लेटफॉर्म्स का उपयोग कर रहे हैं, जिन पर आधिकारिक आयु सीमा 13 वर्ष तय है।
यह अध्ययन स्वीडन के Karolinska Institutet और अमेरिका के Oregon Health & Science University के शोधकर्ताओं ने संयुक्त रूप से किया। इसमें 9 से 14 वर्ष आयु वर्ग के 8,324 बच्चों को चार वर्षों तक लगातार ट्रैक किया गया। शुरुआत में नौ वर्ष के ये बच्चे औसतन प्रतिदिन 30 मिनट सोशल मीडिया इस्तेमाल करते पाए गए, जबकि 13 वर्ष की उम्र तक यह समय बढ़कर ढाई घंटे प्रतिदिन तक पहुंच गया।
दौरान-ए-अध्ययन एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति सामने आई—सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताने वाले बच्चों में समय के साथ inattention यानी ध्यान केंद्रित न कर पाने के लक्षण बढ़ते चले गए। विशेष बात यह रही कि शोध में बच्चों में hyperactivity या impulsive behaviour में कोई विशेष वृद्धि दर्ज नहीं हुई। साथ ही टीवी देखने या वीडियो गेम खेलने से बच्चों में ऐसा प्रभाव नहीं देखा गया, जो इस निष्कर्ष को और स्पष्ट बनाता है।
Karolinska Institutet के प्रोफेसर टॉर्केल क्लिंगबर्ग ने बताया कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लगातार आने वाले नोटिफिकेशन, संदेश और उनसे उत्पन्न मानसिक व्यस्तता बच्चों के दिमाग की फोकस करने की क्षमता को बाधित करती है। शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि सोशल मीडिया का यह प्रभाव बच्चों की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि या ADHD से जुड़ी आनुवंशिक प्रवृत्ति से प्रभावित नहीं पाया गया। अर्थात् यह समस्या सार्वभौमिक है और सभी समूहों के बच्चों में समान रूप से देखी गई।
अध्ययन के अनुसार, यह असर भले ही व्यक्तिगत स्तर पर सामान्य प्रतीत हो, लेकिन पूरी आबादी पर इसके सामूहिक प्रभाव के परिणाम व्यापक और चिंताजनक हो सकते हैं। विशेषज्ञों की माने तो बच्चों के लिए डिजिटल उपयोग का संतुलन, अभिभावकों की निगरानी और प्लेटफॉर्म्स की आयु-सीमा नीति पर कड़ाई भविष्य में इस चुनौती को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
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Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
