मुंबई। भारत में दवा-प्रतिरोधी संक्रमण तेजी से एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले रहे हैं। इस खतरे को लेकर हाल ही में मुंबई में आयोजित CIDSCON 2025 में देश-विदेश से आए चिकित्सा विशेषज्ञों ने स्पष्ट चेतावनी दी कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह समस्या आने वाले वर्षों में स्वास्थ्य तंत्र पर अभूतपूर्व दबाव बना सकती है। सम्मेलन में यह भी कहा गया कि इन संक्रमणों पर नियंत्रण पाने के लिए चिकित्सा शिक्षा में सुधार, संक्रमण नियंत्रण नीतियों को सख्ती से लागू करना और एंटीबायोटिक के विवेकपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देना अनिवार्य है।

विशेषज्ञों के अनुसार, दवा-प्रतिरोधी संक्रमण तब विकसित होते हैं जब बैक्टीरिया, वायरस या अन्य सूक्ष्मजीव उन दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं, जो पहले उन्हें मारने में प्रभावी थीं। इसका परिणाम यह होता है कि सामान्य संक्रमण भी गंभीर रूप ले लेते हैं और इलाज कठिन, महंगा और समय-साध्य हो जाता है। CIDSCON 2025 में प्रस्तुत आंकड़ों और शोध निष्कर्षों ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत इस चुनौती से सबसे अधिक प्रभावित देशों में शामिल हो सकता है।

सम्मेलन के दौरान यह बताया गया कि अस्पतालों में लंबे समय तक भर्ती रहने वाले मरीजों, आईसीयू में उपचाराधीन लोगों और कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले व्यक्तियों में दवा-प्रतिरोधी संक्रमण का खतरा अधिक होता है। कई मामलों में यह संक्रमण तेजी से फैलते हैं और अन्य मरीजों तक भी पहुंच जाते हैं, जिससे पूरे वार्ड या अस्पताल की व्यवस्था पर असर पड़ता है। विशेषज्ञों ने इस पर चिंता जताते हुए कहा कि यदि संक्रमण नियंत्रण के मानकों को सख्ती से लागू नहीं किया गया, तो हालात और भी बिगड़ सकते हैं।

CIDSCON 2025 में यह भी रेखांकित किया गया कि भारत में एंटीबायोटिक दवाओं का अत्यधिक और अनियंत्रित उपयोग इस समस्या को और गंभीर बना रहा है। बिना डॉक्टर की सलाह के दवाओं का सेवन, अधूरा कोर्स और गलत खुराक जैसे कारण बैक्टीरिया को और अधिक मजबूत बना देते हैं। इस संदर्भ में सम्मेलन में यह सुझाव दिया गया कि मेडिकल पाठ्यक्रमों में संक्रमण नियंत्रण और एंटीबायोटिक स्टूअर्डशिप को प्रमुखता दी जानी चाहिए।

सरकारी और स्वास्थ्य नियामक संस्थाओं की भूमिका पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने कहा कि संक्रमण नियंत्रण से जुड़ी नीतियों को केवल कागजों तक सीमित न रखते हुए जमीनी स्तर पर लागू करना होगा। अस्पतालों में स्वच्छता, उपकरणों की नियमित नसबंदी और स्वास्थ्यकर्मियों के लिए निरंतर प्रशिक्षण को अनिवार्य बनाने पर जोर दिया गया। साथ ही, निगरानी तंत्र को मजबूत करने की आवश्यकता भी बताई गई, ताकि दवा-प्रतिरोधी मामलों की समय रहते पहचान हो सके।

सम्मेलन में यह भी बताया गया कि यह संकट केवल चिकित्सा क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना पर भी पड़ सकता है। इलाज की बढ़ती लागत, लंबे समय तक अस्पताल में रहने की मजबूरी और उत्पादकता में गिरावट जैसे कारक इसे एक व्यापक राष्ट्रीय चुनौती बना देते हैं। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि यदि समय रहते इस दिशा में समन्वित प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाले दशक में यह समस्या महामारी जैसी स्थिति पैदा कर सकती है।

CIDSCON 2025 के मंच से दिया गया यह संदेश बेहद स्पष्ट है कि दवा-प्रतिरोधी संक्रमण से लड़ाई केवल डॉक्टरों या अस्पतालों की नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की जिम्मेदारी है। शिक्षा, नीति और व्यवहार—इन तीनों स्तरों पर बदलाव ही इस संकट को थाम सकता है। यह सम्मेलन न केवल चेतावनी है, बल्कि एक अवसर भी है, जहां से भारत एक संगठित और प्रभावी रणनीति बनाकर भविष्य की इस अदृश्य चुनौती का सामना कर सकता है।

Pratahkal Hub

Pratahkal Hub

प्रातःकाल हब, दै.प्रातःकाल की वह समर्पित संपादकीय टीम है, जो सटीक, सामयिक और निष्पक्ष समाचार पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध है। हमारा प्रातःकाल हब राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय मामलों में सत्यापित रिपोर्टिंग, गहन विश्लेषण और जिम्मेदार पत्रकारिता पर अपना ध्यान केंद्रित करता है।"

Next Story