देश की सुरक्षा एजेंसियों ने हाल ही में एक ऐसी साज़िश का पर्दाफाश किया है जिसने पूरे देश को चौका दिया। गुजरात एंटी-टेररिज़्म स्क्वॉड (ATS) ने हैदराबाद के एक डॉक्टर समेत तीन संदिग्धों को गिरफ्तार किया, जिन पर जैविक हथियार 'राइसिन" से आतंकी हमला करने की योजना बनाने का आरोप है। डॉक्टर के कब्जे से दो पिस्तौल, 30 से अधिक राउंड गोलियां और लगभग चार लीटर कैस्टर ऑयल बरामद किया गया, जो राइसिन के संभावित स्रोत के रूप में देखा जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि आरोपी ने हाल के महीनों में दिल्ली, लखनऊ और अहमदाबाद के व्यस्त बाज़ारों का सर्वे किया था, ताकि बड़े पैमाने पर हमला किया जा सके।

गिरफ्तारी के बाद जांच एजेंसियों ने बताया कि यह डॉक्टर एक बड़े नेटवर्क से जुड़ा हो सकता है, जिसके तार विदेश में बैठे आतंकी संगठनों से जुड़े हैं। मामले में यूएपीए (Unlawful Activities Prevention Act) और आर्म्स एक्ट की धाराओं के तहत कार्रवाई की गई है। पिछले चार दिनों में देश के अलग-अलग हिस्सों से चार डॉक्टरों की गिरफ्तारी ने यह संकेत दिया है कि आतंकवाद अब केवल बंदूक और बम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उच्च शिक्षित पेशेवरों तक अपनी जड़ें फैला रहा है।

अब सवाल उठता है ; आखिर यह राइसिन है क्या, और क्यों इसे इतना खतरनाक माना जाता है?

राइसिन एक अत्यंत जहरीला प्रोटीन है जो अरंडी (Castor) के बीजों से प्राप्त होता है। यही पौधा जिससे कैस्टर ऑयल तैयार किया जाता है, औषधीय रूप से तो उपयोगी है, लेकिन इसी बीज में मौजूद राइसिन तत्व बेहद घातक होता है। यह किसी भी प्रकार से तैयार करना या उसका प्रयोग करना पूरी तरह से अवैध है, क्योंकि यह अंतरराष्ट्रीय जैविक हथियार संधियों के तहत प्रतिबंधित है।

राइसिन शरीर के भीतर पहुंचते ही कोशिकाओं की प्रोटीन संश्लेषण प्रक्रिया रोक देता है, जिससे शरीर के अंग धीरे-धीरे काम करना बंद कर देते हैं। अगर यह ज़हर साँस के ज़रिए शरीर में जाए तो यह फेफड़ों को नष्ट करता है, जबकि खाने या इंजेक्शन के माध्यम से जाने पर यह यकृत, गुर्दे और पाचन तंत्र को गंभीर नुकसान पहुँचाता है। इसके लक्षणों में तेज़ बुखार, उल्टी, दस्त, पेट में दर्द, और सांस लेने में कठिनाई शामिल हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, कुछ मिलीग्राम राइसिन भी मानव शरीर के लिए घातक हो सकता है। इसकी कोई निर्धारित सुरक्षित सीमा नहीं है, यानी यह जितनी भी छोटी मात्रा में हो, जानलेवा साबित हो सकती है। यही वजह है कि राइसिन को कई देशों ने ‘कैटेगरी बी बायोलॉजिकल एजेंट’ घोषित किया है, यानी ऐसा विष जो जनस्वास्थ्य और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।

सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि राइसिन का आज तक कोई एंटीडोट (Antidote) नहीं खोजा जा सका है। इसका इलाज केवल सहायक उपचार (supportive care) के रूप में किया जाता है, जैसे सांस लेने में सहायता, तरल पदार्थ की पूर्ति और अंगों के कार्य को बनाए रखने का प्रयास। अगर पीड़ित को समय रहते चिकित्सा मिल जाए तो जीवित रहने की संभावना थोड़ी बढ़ जाती है, लेकिन देर होने पर यह लगभग असंभव हो जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ऐसी साज़िश सफल हो जाती, तो यह सैकड़ों जानें ले सकती थी। एटीएस की समय पर कार्रवाई ने न केवल एक संभावित जैविक हमले को रोका, बल्कि यह चेतावनी भी दी कि आतंकवादी नेटवर्क अब विज्ञान और चिकित्सा के ज्ञान को भी अपने घातक इरादों के लिए हथियार बना रहे हैं। यह घटना एक गंभीर संदेश छोड़ती है, आधुनिक आतंकवाद अब केवल बंदूक की नहीं, बल्कि प्रयोगशाला की भी भाषा बोलने लगा है।

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Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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