नई दिल्ली: याददाश्त का धीरे-धीरे धुंधला जाना और अपनों के ही चेहरों से अपरिचित हो जाना—डिमेंशिया केवल एक बीमारी नहीं, बल्कि एक गहरा मानवीय संकट बनता जा रहा है। जैसे-जैसे भारत की जनसंख्या में वृद्धों का अनुपात बढ़ रहा है, चिकित्सा जगत के सामने एक ऐसी चुनौती खड़ी हो गई है जिसका समाधान वर्तमान शिक्षा प्रणाली में शायद पूरी तरह उपलब्ध नहीं है। इसी गंभीर विषय पर मंथन करने के लिए देश के जाने-माने स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने एक सुर में चिकित्सा और मनोविज्ञान के पाठ्यक्रमों में आमूलचूल बदलाव की वकालत की है। विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि यदि समय रहते एमबीबीएस और मनोविज्ञान के छात्रों को डिमेंशिया के प्रति विशेष रूप से प्रशिक्षित नहीं किया गया, तो भविष्य में यह स्थिति एक अनियंत्रित स्वास्थ्य आपातकाल का रूप ले सकती है।

इस विचार-विमर्श की शुरुआत करते हुए विशेषज्ञों ने बताया कि वर्तमान में हमारे मेडिकल छात्र एनाटॉमी और फिजियोलॉजी का गहन अध्ययन तो करते हैं, लेकिन डिमेंशिया जैसे जटिल न्यूरो-डीजेनेरेटिव विकारों के प्रति उनका प्रशिक्षण केवल सैद्धांतिक स्तर तक ही सीमित है। इस महत्वपूर्ण चर्चा में डॉ. राजेश सागर, जो कि एम्स दिल्ली में मनोरोग विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर हैं, ने जोर देकर कहा कि डिमेंशिया की देखभाल को केवल एक विशेष विभाग तक सीमित नहीं रखा जा सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक प्रारंभिक स्तर पर डॉक्टरों और मनोवैज्ञानिकों को इसकी बारीकियों का ज्ञान नहीं होगा, तब तक मरीजों को वह 'डिग्निटी' और सही उपचार नहीं मिल पाएगा जिसके वे हकदार हैं।

इसी कड़ी में मनोचिकित्सक डॉ. सुवर्णा ज्योति और डॉ. अमित सिंह ने व्यावहारिक चुनौतियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने रेखांकित किया कि कई बार प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर डिमेंशिया के लक्षणों को उम्र बढ़ने का एक सामान्य हिस्सा मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। इस अंतर को पाटने के लिए विशेषज्ञों ने मांग की है कि डिमेंशिया केयर को मेडिकल और साइकोलॉजी के करिकुलम में एक अनिवार्य हिस्से के रूप में शामिल किया जाए। डॉ. मीनाक्षी खन्ना ने सामाजिक पहलू को जोड़ते हुए कहा कि डिमेंशिया केयर केवल दवाई देने तक सीमित नहीं है, इसमें मरीज के परिवार को दी जाने वाली काउंसलिंग और केयरगिवर के मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी अनिवार्य है, जिसके लिए मनोविज्ञान के छात्रों को विशेष क्लीनिकल एक्सपोजर की आवश्यकता है।

चर्चा के दौरान कानूनी और आधिकारिक पहलुओं पर भी विमर्श हुआ। विशेषज्ञों ने 'मेंटल हेल्थकेयर एक्ट 2017' का संदर्भ देते हुए कहा कि मरीजों के अधिकारों की रक्षा तभी संभव है जब स्वास्थ्यकर्मी कानूनी और नैतिक दोनों मोर्चों पर तैयार हों। सरकारी निकायों और मेडिकल काउंसिल से यह आग्रह किया गया है कि वे पाठ्यक्रम में नए मॉड्यूल जोड़ें जो न केवल रोग के निदान, बल्कि संवाद कौशल (Communication Skills) और सहानुभूति (Empathy) पर केंद्रित हों। डॉ. विकास कुमार ने अपनी बात रखते हुए कहा कि हमें एक ऐसे 'डिमेंशिया फ्रेंडली' समाज का निर्माण करना होगा जहाँ स्वास्थ्य प्रणालियाँ किसी बोझ की तरह नहीं, बल्कि एक ढाल की तरह काम करें।

इस चर्चा का निष्कर्ष यह निकला कि डिमेंशिया देखभाल का एकीकरण केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि एक अनिवार्य मानवीय आवश्यकता है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि डिमेंशिया के मामलों में होने वाली बेतहाशा वृद्धि को देखते हुए अब और देरी करने की गुंजाइश नहीं बची है। यदि आज हम अपने भविष्य के डॉक्टरों और काउंसलर्स को सुसज्जित नहीं करेंगे, तो कल की पीढ़ी एक ऐसी खामोश त्रासदी का सामना करेगी जिसका इलाज हमारे पास नहीं होगा। यह आह्वान केवल शिक्षा जगत के लिए नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य ढांचे के लिए एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है।

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