भारत में 62% मुंह के कैंसर के पीछे शराब और तंबाकू का सेवन; स्टडी में हुआ खुलासा
भारत में मुंह के कैंसर के 62% मामलों की वजह शराब और धुआं रहित तंबाकू का सेवन है। नई स्टडी में पाया गया कि स्थानीय शराब और तंबाकू के संयोजन से बक्कल म्यूकोसा कैंसर का खतरा सबसे ज्यादा बढ़ता है। शोधकारों ने इसे रोकने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य उपाय जरूरी बताया।

bharat me munh ka cancer 2025 : भारत में मुंह के कैंसर के बढ़ते मामलों के पीछे शराब और धुआं रहित तंबाकू उत्पादों का सेवन सबसे बड़ा कारण बनता जा रहा है। बुधवार को प्रकाशित एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि देश में बक्कल म्यूकोसा कैंसर के 62 प्रतिशत मामलों में गुटखा, खैनी, पान जैसे धुआं रहित तंबाकू उत्पाद और स्थानीय शराब का सेवन प्रमुख भूमिका निभा रहा है।
महाराष्ट्र में सेंटर फॉर कैंसर एपिडेमियोलॉजी और होमी भाभा नेशनल इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया कि दिन में 2 ग्राम से कम बीयर पीने से भी बक्कल म्यूकोसा कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। वहीं, लगभग 9 ग्राम शराब, जो एक मानक ड्रिंक के बराबर है, से मुंह के कैंसर का खतरा लगभग 50 प्रतिशत तक बढ़ जाता है।
देशभर में शराब और तंबाकू मिश्रण से मुंह के कैंसर के मामले कुछ राज्यों में 14 प्रतिशत तक पहुंच चुके हैं। अध्ययन में यह भी सामने आया कि स्थानीय शराब में मेथनॉल और एसीटैल्डिहाइड जैसे टॉक्सिन की मिलावट अधिक होने के कारण यह स्वास्थ्य के लिए और खतरनाक बनती है। सालाना अनुमान के अनुसार भारत में मुंह का कैंसर लगभग 1.44 लाख नए मामलों के साथ हर साल 80 हजार लोगों की जान ले रहा है।
ग्रेस सारा जॉर्ज के नेतृत्व वाली रिसर्च टीम ने बताया कि शराब मुंह की अंदरूनी परत (फैट) को कमजोर कर देती है, जिससे तंबाकू उत्पादों में मौजूद कार्सिनोजेन अधिक प्रभावी हो जाते हैं। इस कारण शराब और तंबाकू का संयोजन मुंह के कैंसर के जोखिम को कई गुना बढ़ा देता है।
शोध में यह भी स्पष्ट हुआ कि शराब पीने वालों में मुंह का कैंसर खतरा 68 प्रतिशत अधिक होता है, जबकि स्थानीय शराब पीने वालों में यह 87 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। अध्ययन के अनुसार मुंह का कैंसर मुख्य रूप से बक्कल म्यूकोसा यानी गालों और होठों की मुलायम परत में होता है। इन मरीजों में से लगभग 43 प्रतिशत ही पांच साल से अधिक जीवित रहते हैं।
शोधकर्ताओं का निष्कर्ष यह है कि मुंह के कैंसर से बचने के लिए शराब और तंबाकू से पूरी तरह बचाव आवश्यक है। कोई सुरक्षित सीमा नहीं है, इसलिए सार्वजनिक स्वास्थ्य उपाय और जागरूकता अभियान जरूरी हैं। इस अध्ययन के परिणाम स्पष्ट संकेत देते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर पब्लिक हेल्थ इंटर्वेंशन्स के माध्यम से ही बक्कल म्यूकोसा कैंसर के बढ़ते मामलों पर नियंत्रण पाया जा सकता है।
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Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
