नई दिल्ली: चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में एक ऐसा क्षण आ गया है जो लाखों महिलाओं के जीवन में आशा की नई किरण बनकर उभरा है। स्तन कैंसर, जो दुनिया भर में महिलाओं के लिए एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बना हुआ है, अब एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई आधारित क्रांतिकारी तकनीक के निशाने पर है। वैज्ञानिकों ने एक ऐसा 'नॉन-इन्वेसिव' (बिना चीर-फाड़ वाला) एआई टूल विकसित किया है, जो बिना किसी दर्दनाक बायोप्सी या सुई के शुरुआती चरणों में ही कैंसर की सटीक पहचान करने में सक्षम है। यह तकनीक अब अपने सबसे महत्वपूर्ण चरण यानी क्लिनिकल पायलट फेज में प्रवेश कर चुकी है, जो कैंसर निदान के पारंपरिक तरीकों को पूरी तरह से बदलने की क्षमता रखती है।

इस अभूतपूर्व परियोजना का नेतृत्व भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के महानिदेशक डॉ. राजीव बहल और विख्यात कैंसर विशेषज्ञ डॉ. आर. सुब्रमण्यम की देखरेख में किया जा रहा है। शोधकर्ताओं की टीम ने इस एआई मॉडल को हज़ारों डिजिटल मैमोग्राम और पैथोलॉजी रिपोर्ट के डेटा पर प्रशिक्षित किया है। इस परीक्षण के मुख्य अन्वेषणकर्ता डॉ. अमित शाह के अनुसार, यह टूल शरीर के ऊतकों को नुकसान पहुँचाए बिना केवल थर्मल मैपिंग और एआई एल्गोरिदम के माध्यम से ट्यूमर की प्रकृति का पता लगा सकता है। क्लिनिकल पायलट चरण के दौरान, दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) की वरिष्ठ ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. सुप्रिया वर्मा और उनकी टीम इस तकनीक की प्रभावकारिता की जांच कर रही हैं, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि एआई द्वारा दिए गए परिणाम शत-प्रतिशत सटीक हों।

इस तकनीक के व्यावहारिक पक्ष को साझा करते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय की सचिव पुण्य सलिला श्रीवास्तव ने बताया कि यह टूल विशेष रूप से ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में गेम-चेंजर साबित होगा, जहाँ उन्नत नैदानिक उपकरणों की कमी है। नीति आयोग के सदस्य (स्वास्थ्य) डॉ. वी.के. पॉल ने इस परियोजना को 'आत्मनिर्भर भारत' और 'डिजिटल हेल्थ मिशन' का एक उत्कृष्ट उदाहरण बताया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि एआई न केवल डॉक्टरों का बोझ कम करेगा, बल्कि मानव त्रुटि की संभावनाओं को भी न्यूनतम स्तर पर ले आएगा। इस पायलट प्रोजेक्ट में प्रौद्योगिकी भागीदार के रूप में सॉफ्टवेयर इंजीनियर राजेश खन्ना और डेटा वैज्ञानिक निशा रेड्डी की टीम ने एआई की गति और शुद्धता को परिष्कृत करने में दिन-रात एक किया है।

विधिक और सुरक्षा मानकों के दृष्टिकोण से, केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) के ड्रग कंट्रोलर जनरल डॉ. राजीव सिंह रघुवंशी ने इस परीक्षण के लिए कड़े दिशानिर्देश जारी किए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया है कि पायलट फेज के दौरान रोगियों की गोपनीयता और डेटा सुरक्षा सर्वोपरि होगी। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जे.पी. नड्डा ने इस उपलब्धि की सराहना करते हुए कहा है कि सरकार इस तकनीक को सफल परीक्षण के बाद आयुष्मान भारत योजना के तहत देशभर के स्वास्थ्य केंद्रों में एकीकृत करने की योजना बना रही है।

इस वैज्ञानिक उपलब्धि का समापन चिकित्सा जगत में एक नए युग की दस्तक है। स्तन कैंसर का शुरुआती पता चलना ही उपचार की सफलता की सबसे बड़ी कुंजी है, और यह एआई टूल उसी कुंजी को और अधिक सुलभ और सरल बना रहा है। यदि यह क्लिनिकल पायलट फेज सफल रहता है, तो वह दिन दूर नहीं जब कैंसर की जांच उतनी ही सामान्य और सरल हो जाएगी जितनी कि एक नियमित स्वास्थ्य जांच। यह न केवल चिकित्सा लागत को कम करेगा, बल्कि अनगिनत महिलाओं को शारीरिक और मानसिक पीड़ा से भी बचाएगा। यह तकनीक भविष्य के चिकित्सा विज्ञान की वह नींव है, जहाँ तकनीक और संवेदनशीलता मिलकर जीवन की रक्षा करेंगे।

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