Children Mental Health Impact : आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और तकनीक के चकाचौंध के बीच मासूमियत कहीं खोती जा रही है। एक समय था जब बच्चों की दुनिया मैदानों की धूल और दोस्तों के शोर में बसती थी, लेकिन अब वह सिमटकर स्मार्टफोन की स्क्रीन और प्रतिस्पर्धा की अंतहीन दौड़ तक रह गई है। आधुनिक जीवनशैली, पढ़ाई का भारी बोझ और सोशल मीडिया के आभासी संसार ने बच्चों के कोमल मन पर एक ऐसा गहरा और अदृश्य मनोवैज्ञानिक दबाव डाल दिया है, जो भविष्य के लिए किसी बड़े खतरे की आहट से कम नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य अब केवल एक चर्चा का विषय नहीं, बल्कि एक आपातकालीन स्थिति है जिस पर तत्काल ध्यान देना अनिवार्य हो गया है।

इस मानसिक संकट की पहली और सबसे महत्वपूर्ण कड़ी घर का माहौल और माता-पिता का व्यवहार है। मनोविज्ञान के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार, घर वह पहली प्रयोगशाला है जहाँ बच्चा भावनाओं को समझना और व्यक्त करना सीखता है। यदि घर के भीतर तनाव, निरंतर डांट-फटकार और संवाद की कमी हो, तो बच्चा असुरक्षा के भंवर में फंस जाता है। जब माता-पिता बच्चों की भावनाओं को सुनने के बजाय उन पर अपनी अपेक्षाओं का बोझ लादते हैं, तो बच्चा धीरे-धीरे अंतर्मुखी होने लगता है और अपनी भावनाओं को दबाने लगता है। यही दबा हुआ आक्रोश और डर आगे चलकर गंभीर चिंता (Anxiety) और आत्मविश्वास की कमी का कारण बनता है, जबकि प्यार और समझदारी का माहौल उनके मानसिक विकास के लिए ढाल का काम करता है।

संकट का दूसरा बड़ा केंद्र स्कूल और शिक्षा व्यवस्था है, जो अब ज्ञान के अर्जन से ज्यादा अंकों की 'रैट रेस' में तब्दील हो चुकी है। स्कूल में लगातार तुलना और सख्त अनुशासन के बीच बच्चे के मन में असफलता का एक स्थायी भय घर कर जाता है। जब एक छात्र को उसकी क्षमता के बजाय केवल ग्रेड कार्ड से आंका जाता है, तो उसका दिमाग तनाव की अवस्था में चला जाता है, जिससे उसकी सीखने की स्वाभाविक क्षमता बाधित होती है। इसके अतिरिक्त, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग इस आग में घी का काम कर रहा है। सोशल मीडिया पर दूसरों की कृत्रिम सफलता और सुंदरता देखकर बच्चों में हीन भावना (Inferiority Complex) पनप रही है। चूंकि बच्चों का मस्तिष्क पूरी तरह विकसित नहीं होता, वे ऑनलाइन मिलने वाली नकारात्मक सूचनाओं और टिप्पणियों को सच मानकर अवसाद की ओर बढ़ने लगते हैं।

कानूनी और सामाजिक दृष्टिकोण से देखें तो बच्चों के अधिकारों में उनके मानसिक कल्याण का अधिकार सर्वोपरि है। बाल विशेषज्ञों का तर्क है कि यदि समय रहते शैक्षणिक नीतियों और पारिवारिक ढांचे में बदलाव नहीं किया गया, तो हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर देंगे जो तकनीकी रूप से तो उन्नत होगी, लेकिन मानसिक रूप से अत्यंत भंगुर। अंततः, यह समझना आवश्यक है कि एक स्वस्थ समाज का निर्माण तभी संभव है जब हमारे बच्चे मानसिक रूप से स्वतंत्र और सुरक्षित महसूस करें। अब समय आ गया है कि हम स्क्रीन और सिलेबस के बोझ को कम कर उनके बचपन को वापस लौटाएं, ताकि उनकी खामोश सिसकियाँ एक स्वस्थ संवाद में बदल सकें।

Updated On
Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

Next Story