राजस्थान हाईकोर्ट ने आत्महत्या के लिए उकसाने के तीन आरोपियों को किया बरी, धारा 306 पर महत्वपूर्ण टिप्पणी
राजस्थान हाईकोर्ट ने नोहर के 2011 के आत्महत्या मामले में तीन आरोपियों को बरी कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल पैसों की मांग से धारा 306 नहीं लगाई जा सकती। साक्ष्यों और बरामदगी प्रक्रिया में कमियों के कारण अदालत ने यह फैसला सुनाया, जो धारा 306 की व्याख्या में महत्वपूर्ण है।

नोहर, राजस्थान। राजस्थान उच्च न्यायालय ने 15 नवंबर को नोहर के बहुचर्चित आत्महत्या मामले में तीन आरोपियों—हनुमान गोसाई, अशोक कंदोई और गौरव—को बरी कर दिया। यह मामला वर्ष 2011 का है, जब नोहर कस्बे के दुकानदार मनोज कुमार सोनी ने आत्महत्या कर ली थी। मामले में आरोप लगाया गया था कि आरोपियों ने पैसों की मांग कर मनोज को आत्महत्या के लिए उकसाया।
साल 2011 में 22 मार्च को पुलिस को एक सुसाइड नोट मिला, जिसमें हनुमान गोसाई, अशोक कंदोई और गौरव पर मनोज को आत्महत्या के लिए मजबूर करने का आरोप था। इस सुसाइड नोट के आधार पर एफआईआर दर्ज की गई और 2013 में सत्र न्यायालय ने तीनों आरोपियों को सात वर्ष कैद की सजा सुनाई। इसके बाद आरोपियों ने राजस्थान हाईकोर्ट में अपील दायर की।
न्यायमूर्ति संदीप शाह की एकलपीठ ने साक्ष्यों का परीक्षण करते हुए कई गंभीर खामियों की ओर ध्यान दिलाया। कोर्ट ने नोट की बरामदगी प्रक्रिया पर सवाल उठाए। सुसाइड नोट आत्महत्या स्थल से एक दिन बाद बरामद हुआ था, जबकि कमरे पर ताला लगा था। यह स्पष्ट नहीं हो सका कि ताला किसने खोला और नोट कैसे सुरक्षित रखा गया। एफएसएल रिपोर्ट में नोट पर हस्ताक्षर मनोज के माने गए, लेकिन लिखावट प्रमाणित नहीं हो सकी।
साक्ष्यों और गवाहों की विश्वसनीयता पर भी हाईकोर्ट ने सवाल उठाया। गवाहों के बयान विसंगतियों से भरे हुए थे, और किसी के पास यह प्रमाण नहीं था कि आरोपियों ने मनोज को आत्महत्या के लिए मजबूर किया। इस आधार पर, अपर्याप्त साक्ष्यों और बरामदगी प्रक्रिया की गंभीर कमियों के कारण हाईकोर्ट ने तीनों आरोपियों को बरी कर दिया। मामले में एक अन्य आरोपित शशिकांत पहले ही निधन हो चुका है।
न्यायालय ने धारा 306 की व्याख्या पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। न्यायमूर्ति संदीप शाह ने स्पष्ट किया कि आत्महत्या के लिए उकसाने की धारा तब ही लागू होगी जब यह सिद्ध हो जाए कि आरोपी ने जानबूझकर पीड़ित को ऐसी मानसिक स्थिति में धकेला कि उसके पास आत्महत्या के सिवाय कोई विकल्प नहीं बचा। केवल पैसों की मांग को इस धारा के अंतर्गत आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता।
यह निर्णय कानून और न्याय व्यवस्था में धारा 306 की व्याख्या के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है और भविष्य में ऐसे मामलों के निपटारे में मिसाल बन सकता है।
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Ruturaj Ravan
यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।
