'स्मॉल हाइड्रो स्कीम' से रोशन होगा ग्रामीण भारत; सरकार ने खर्च किए ₹2,500 करोड़
केंद्र सरकार ने 2030-31 तक 1,500 मेगावाट क्षमता जोड़ने और सुदूरवर्ती इलाकों में स्वच्छ बिजली पहुंचाने के लिए वित्तीय सहायता और निवेश को बढ़ावा दिया है।

भारत के पहाड़ी क्षेत्र में स्थित एक लघु जल विद्युत परियोजना जहां नदी के बहते पानी से बिजली का उत्पादन किया जा रहा है।
Small Hydro Power Development Scheme India 2026 : भारत के सुदूरवर्ती ग्रामीण और पहाड़ी अंचलों में दशकों से चले आ रहे अंधेरे को मिटाने के लिए केंद्र सरकार ने एक क्रांतिकारी 'पावर मास्टरस्ट्रोक' खेला है। स्वच्छ और अटूट ऊर्जा की दिशा में एक बड़ा कदम बढ़ाते हुए सरकार ने “स्मॉल हाइड्रो पावर डेवलपमेंट स्कीम” को आधिकारिक मंजूरी दे दी है। यह केवल एक सरकारी योजना मात्र नहीं है, बल्कि देश के उन दुर्गम इलाकों के लिए उम्मीद की एक नई किरण है जहां आज भी बिजली की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के माध्यम से छोटी नदियों और झरनों के बहते पानी का उपयोग कर स्थानीय स्तर पर बिजली पैदा की जाएगी, जिससे न केवल ऊर्जा संकट का समाधान होगा बल्कि ग्रामीण विकास को भी नई गति मिलेगी।
योजना के तकनीकी और वित्तीय पहलुओं पर गौर करें तो सरकार ने इसके लिए 2,584.60 करोड़ रुपये का भारी-भरकम बजट आवंटित किया है। इस वृहद लक्ष्य के तहत वर्ष 2026-27 से 2030-31 की अवधि के बीच लगभग 1,500 मेगावाट की नई जल विद्युत क्षमता को ग्रिड से जोड़ने की तैयारी है। वर्तमान में भारत अपनी 21,133 मेगावाट की कुल संभावित छोटी जल विद्युत क्षमता का केवल एक चौथाई हिस्सा ही उपयोग कर पा रहा है। ऐसे में यह नई स्कीम शेष अपार संभावनाओं को हकीकत में बदलने का काम करेगी। विशेष रूप से उत्तर-पूर्वी राज्यों और सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए यह योजना वरदान साबित होगी, क्योंकि यहाँ परियोजनाओं की लागत का एक बड़ा हिस्सा केंद्र सरकार स्वयं वहन करेगी, जिससे निजी निवेश के लिए भी दरवाजे खुलेंगे।
आर्थिक मोर्चे पर यह योजना एक बड़े बदलाव की वाहक बनने जा रही है, जिससे इस क्षेत्र में करीब 15,000 करोड़ रुपये के निवेश की उम्मीद जताई गई है। रोजगार के दृष्टिकोण से भी यह आंकड़ा काफी उत्साहजनक है, जहाँ निर्माण कार्य के दौरान लगभग 51 लाख व्यक्ति-दिन का रोजगार सृजित होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये छोटे हाइड्रो प्रोजेक्ट्स पर्यावरण के प्रति पूरी तरह संवेदनशील हैं। इनमें न तो बड़े बांधों की तरह विशाल भूमि की आवश्यकता होती है और न ही इनसे प्रदूषण फैलता है। यह योजना प्रधानमंत्री के आत्मनिर्भर भारत और 2070 तक नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगी, जो ग्रामीण भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में न केवल सशक्त बनाएगी बल्कि आत्मनिर्भर भी करेगी।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
